Author(s): बीजू राम, सुनील कुमार कुमेटी

Email(s): beejuramnetam94@gmail.com

DOI: 10.52711/2454-2679.2026.00015   

Address: बीजू राम1*, सुनील कुमार कुमेटी2
1शोधार्थी, अर्थशास्त्र अध्ययनशाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर, छत्तीसगढ़, भारत ।
2सह-प्राध्यापक, अर्थशाास्त्र अध्ययनशाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर, छत्तीसगढ़, भारत ।
*Corresponding Author

Published In:   Volume - 14,      Issue - 1,     Year - 2026


ABSTRACT:
छत्तीसगढ़ के कोण्डागांव जिले में आदिवासी समुदाय की आजीविका का प्रमुख आधार लघु वनोपज है। महुआ, तेंदूपत्ता, इमली, हर्रा, लाख, चिरौंजी, शहद आदि जैसे लघु वनोपज आदिवासी परिवारों की आय, रोजगार और जीवन-निर्वाह के महत्वपूर्ण साधन हैं। भारत में करोड़ों लोग लघु वनोपज के संग्रह और विपणन से रोजगार प्राप्त करते हैं, जिनमें बड़ी संख्या आदिवासी समुदाय की है। यह अध्ययन कोण्डागांव जिले के आदिवासी परिवारों में लघु वनोपज विपणन संस्थाओं के योगदान का विश्लेषण करता है। राज्य में लघु वनोपज के संग्रह, प्रसंस्करण और विपणन को व्यवस्थित करने के लिए विभिन्न संस्थाएँ कार्यरत हैं, जिनमें राज्य लघु वनोपज संघ, जिला वनोपज सहकारी संघ, प्राथमिक वनोपज सहकारी समितियां कार्यरत, वन धन विकास केंद्र और स्वयं सहायता समूह प्रमुख हैं। विपणन के साथ ही वन धन विकास केंद्रों के माध्यम से वनोपजों का मूल्य संवर्धन, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और ब्रांडिंग की व्यवस्था की जाती है, जिससे कच्चे उत्पादों को तैयार करके उपयोगिक वस्तुओं में बदलकर अधिक आय अर्जित की जाती है। इन संस्थाओं का मुख्य उद्देश्य लघु वनोपज संग्राहकों को उचित मूल्य उपलब्ध कराना, बिचौलियों की भूमिका को कम करना तथा आदिवासी परिवारों की आय में वृद्धि करना है। अतः यह कहा जा सकता है कि लघु वनोपज विपणन संस्थाएँ कोण्डागांव जिले के आदिवासी परिवारों के सामाजिक-आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। इनके प्रभाव से आय में वृद्धि, रोजगार सृजन, महिला सशक्तिकरण तथा सतत् वन प्रबंधन को प्रोत्साहन मिला है। भविष्य में यदि इन संस्थाओं को बेहतर बाजार संपर्क, प्रसंस्करण सुविधाएँ और प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाए तो यह आदिवासी समुदाय की आजीविका और ग्रामीण विकास को और अधिक सुदृढ़ कर सकती हैं। प्रस्तुत शोध अध्ययन प्राथमिक आंकड़ों पर आधारित है। आंकड़ो का संकलन प्रत्यक्ष अनुसूची एवं द्विस्तरी निदर्शन विधि की सहायता से किया गया है। अध्ययन में कोण्डागांव विकासखण्ड के 15 गांव में 120 परिवार को दैव निदर्शन विधि की सहायता से लिया गया है।


Cite this article:
बीजू राम, सुनील कुमार कुमेटी. कोण्डागांव जिला के आदिवासी परिवारों के आर्थिक विकस में लघु वनोपज विपणन संस्थाओं का योगदान. International Journal of Advances in Social Sciences. 2026; 14(1):67-2. doi: 10.52711/2454-2679.2026.00015

Cite(Electronic):
बीजू राम, सुनील कुमार कुमेटी. कोण्डागांव जिला के आदिवासी परिवारों के आर्थिक विकस में लघु वनोपज विपणन संस्थाओं का योगदान. International Journal of Advances in Social Sciences. 2026; 14(1):67-2. doi: 10.52711/2454-2679.2026.00015   Available on: https://ijassonline.in/AbstractView.aspx?PID=2026-14-1-15


सन्दर्भ सूची:- 
1.    Hasalkar Suma, Veena Jadhav (2004), “Role of Women in the use of non timber forest produce, A review”, Journal of social Science 2004 Vol. 8 No (3) PP.203-206.
2.    Sathya Palana Jyothis (2005), “Household’s dependent on protected forest Evidence from the Western Ghats”, Indian Journal of Agricultural Economic Jan-March 2005 Vol. 60 No. (1) PP 60-70.3.
3.    मिश्रा, वत्सला (2008), “वनोपज द्वारा आय एवं रोजगार सृजन (बस्तर जिले के विशेष संदर्भ में)“, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर की सामाजिक विज्ञान संकाय के अन्तर्गत अर्थशास्त्र विषय में पी-एच.डी. उपाधि हेतु पस्तुत। 
4.    रात्रे, ममता (2021),“जनजातीय समुदाय में वनोंपज संकलन का विश्लेषण (छ.ग. राज्य की मुरिया जनजाति के वनोंपज संकलन में परिवर्तन के विशेश संदर्भ में)“, International Journal of Reviews and Research in Social Sciences, April-June 2021, ISSN: 2347-5145 (Print), 2454-2687 (Online), Vol.09, Issue-02.
5.    छत्तीसगढ़ राज्य लघु वनोपज (व्यापार एवं विकास) सहकारी संघ मर्यादित।

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