Author(s): जीवन लाल

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Address: जीवन लाल शोध छात्र - पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (छ.ग.) 492010 ’ब्वततमेचवदकपदह ।नजीवत म्.उंपसरू श्रममूंदरप888/तमकपििउंपसण्बवउ

Published In:   Volume - 2,      Issue - 1,     Year - 2014


ABSTRACT:
हिन्दी कथा साहित्य में स्त्री विमर्श जिसमें नारी जीवन की अनेक समस्याएं देखने को मिलता है। हिन्दी साहित्य में छायावाद काल से स्त्री-विमर्श का जन्म माना जाता है। महादेवी वर्मा की श्रृंखला की कड़िया नारी सशक्तिकरण का सुन्दर उदाहरण है। प्रेमचंद से लेकर आज तक अनेक पुरूष लेखकों ने स्त्री समस्या को अपना विषय बनाया लेकिन उस रूप् में नहीं लिखा जिस रूप् में स्वयं महिला लेखिकाओं ने लिखी है। अतः स्त्री-विमर्श की शुरूआती गुंज पश्चिम में देखने को मिला। सन् 1960 ई. के आस-पास नारी सशक्तिकरण जोर पकड़ी जिसमें चार नाम चर्चित हैं। उषा प्रियम्वदा, कृष्णा सोबती, मन्नू भण्डारी एवं शिवानी आदि लेखिकाओं ने नारी मन की अन्तद्र्वन्द्वों एवं आप बीती घटनाओं को उकरेना शुरू किए और आज स्त्री-विमर्श एक ज्वलंत मुद्दा है। आठवें दशक तक आते-आते यही विषय एक आन्दोलन का रूप ले लिया जो शुरूआती स्त्री-विमर्श से ज्यादा शक्तिशाली सिद्ध हुआ। आज मैत्रेयी पुष्पा तक आते-आते महिला लेखिकाओं की बाढ़ सी आ गयी जो पितृसत्ता समाज को झकझोर दिया। नारी मुक्ति की गुंज अब देह मुक्ति के रूप में परिलक्षित होने लगा।


Cite this article:
जीवन लाल. हिन्दी साहित्य में स्त्री विमर्श. Int. J. Ad. Social Sciences 2(1): Jan. –Mar., 2014; Page 12-14.


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