Author(s): प्रदीप शर्मा, सी.एल. पटेल

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Address: प्रदीप शर्मा1, डाॅ. सी.एल. पटेल2
1सहायक प्राध्यापक (विधि), पं. रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर (छ.ग.)
2संकाध्यक्ष, विधि अध्ययन शाला, पं. रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर (छ.ग.)

Published In:   Volume - 4,      Issue - 4,     Year - 2016


ABSTRACT:
पीड़ित जनता ने शक्तिशाली और साधन संपन्न लोगों, मुखियाओं सरदारों तथा राजाओं द्वारा दुर्बल वर्गो पर किए जा रहे अत्याचारों को चुपचाप स्वीकार नहीं कर लिया। इतिहास साक्षी है कि जैसे-जैसे उत्पीड़न बढ़ा वैसे-वैसे पीड़ित वर्गो ने अपने अधिकारों के लिए संघर्ष तेज कर दिया। यद्यपि इतिहास में सैंकड़ों ऐसी घटनाएं है पर मैं यहाँ केवल दो घटनाओं को जिक्र करना चाहूंगा:- 1. घटना हम दो शताब्दी ईसा पूर्व के इटली राज्य से लेते है और दूसरी बींसवी शताब्दी के भारत वर्ष से। इन दोनों घटनाओं के बीच के दो हजार वर्ष के समय में पीड़ित जनता ने अपने अधिकारों के लिए कितने संघर्ष किए होंगे। इन समयों में कितने युद्ध और विद्रोह हुए होंगे। इसका अनुमान लगाना मुश्किल है। इटली के ऐतिहासिक जनविद्रोह से शक्तिशाली संभ्रान्त वर्गो द्वारा निर्बल वर्गो के घुटने आर्थिक, सामाजिक एवं शारीरिक शोषण करना आम बात हो गया है। इसी तरह युद्धों के दौरान पकड़े गये व्यक्तियों के खरीदने बेचने के लिए ऐतिहासिक शोध बताते है कि मंडीया स्थापित है। इससे भी अधिक पीड़ादायक उदाहरण भारत की धरती पर मिला जहाँ बींसवी शताब्दी में सभ्य अंग्रेज साम्राज्य ने 1919 में भारत की सीमाओं में रोलेट एक्ट के नाम एक अन्धा कानून लागू किया। जिसमें अंग्रेज पुलिस बिना कारण बताए भारतीयों को जेल में ठूंस देती थी। ऐसे संघर्षो ने ही सन् 1215 ई. में मेग्नाकार्टा के रूप में इस अधिकारों की स्वीकृति का कारण बना। मेग्नाकार्टा की स्वीकृति के बाद मानवाधिकार के संबंध में एक के बाद एक घोषणाएँ होती रही। आज के युग तक आते-आते इन अधिकारों को संविधान ही नहीं अपितु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यताएँ प्राप्त हुई। सं.रा. संघ की घोषणा के पहले इन अधिकारों को अंतर्राष्ट्रीय संधियों और घोषणा पत्र में भी मान्यता दी जाने लगी। फ्रांस की क्रांति के पहले इंग्लैण्ड में बिल आॅफ राइट्स (1689) के द्वारा भी कानून की दृष्टि में एवं समानता तथा प्रजातांत्रिक मूल्यों की घोषणा आदि सम्मिलित किए गए। 26 जून 1945 को हस्ताक्षरित संयुक्त राष्ट्र संघ की घोषणा मानवाधिकार के अंतर्राष्ट्रीय मंच पर स्वीकृति की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इसके पश्चात निरंतर आर्थिक, सांस्कृतिक, सामाजिक क्षेत्रों में होने वाला विनाश को ध्यान में रखकर नये-नये अधिकारों के संबंध में घोषणाएँ लगभग 50 वर्ष के अंतराल में की गई एवं इसके पालन के लिए अंतर्राष्ट्रीय मंचो पर गुहार लगाई गई।1


Cite this article:
प्रदीप शर्मा, सी.एल. पटेल. कैदियों के मानवाधिकार की प्राचीनतम् से वर्तमान व्यवस्था पर विश्लेष्णात्मक अध्ययन. Int. J. Ad. Social Sciences 4(4): Oct.- Dec., 2016; Page 196-200.

Cite(Electronic):
प्रदीप शर्मा, सी.एल. पटेल. कैदियों के मानवाधिकार की प्राचीनतम् से वर्तमान व्यवस्था पर विश्लेष्णात्मक अध्ययन. Int. J. Ad. Social Sciences 4(4): Oct.- Dec., 2016; Page 196-200.   Available on: https://ijassonline.in/AbstractView.aspx?PID=2016-4-4-6


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