Author(s): Vrinda Sengupta

Email(s): Email ID Not Available

DOI: Not Available

Address: Dr. Mrs. Vrinda Sengupta Assistant Professor Sociology, Govt. T.C.L. P.G. College, Janjgir (C.G.) *Corresponding Author

Published In:   Volume - 1,      Issue - 2,     Year - 2013


ABSTRACT:
नारी परिवार की जीवनदायिनी संजीवनी षक्ति है: परिवार सामाजिक संगठन की मौलिक इकाई है यह एक ऐसी इकाई हैं जहां व्यक्ति को बहुत अधिक संतोश मिलता हैं मनुश्य जन्म लेने के बाद सर्वप्रथम परिवार के संपर्क में आता हैं परिवार के सदस्यों का नवजात षिषु पर गहरा प्रभाव पड़ता है यह व्यक्ति के व्यक्तित्व एवं चरित्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हैं। भारतीय संस्कृति में हमेषा नारी को आदर्ष एवं सम्मान की दृश्टि से देखा जा सकता हैं तथा उसे अद्र्धांगिनी की संज्ञा़ भी दी गई हैं। नारी की अस्मिता को मा, बहन, बेटी, बीबी और रखैल की कोटियों से बाहर लाकर स्वतंत्र रूप में निर्मित करने में मदद मिलेगी नारी की व्यक्ति के रूप में अस्मिता को स्थापित करना उसकी संवेदनाओं, भावांे एवं विचारों को अभिव्यक्ति देना स्त्री साहित्य का बुनियादी दायित्व हैं। नारी की अस्मिता, उसकी समस्याओं एवं उसकी अनुभूतियों की व्याख्या पुरूश संदर्भ में करने की मानसिकता से बचना चाहिए। नारी को नारी के सामाजिक संदर्भ में विष्लेशित करने का नजरिया विकसित करना होगा। स्त्री और पुरूश अपनी नई ऐतिहासिक भूमिकाओं कें साथ एक दुसरे के सामने खड़े हैं। हमारी ग्रंथियां इसे जटिल अवष्य बना सकती हैं किन्तु हमारा विवेक और हमारी संवेदनषीलता एक स्वच्छ और पारदर्षी स्वरूप प्रदान कर सकते हैं। षब्द कुंजी- नारी चेतना, मानवाधिकार, वर्तमान दषा-दिषा, मानवीय संवेदना।


Cite this article:
Vrinda Sengupta. नारी चेतना] मानवाधिकार: नई दषा-दिषा एवं अस्तित्व की पहचान. Int. J. Ad. Social Sciences 1(2): Oct. - Dec. 2013; Page 58-60.


Recomonded Articles:

International Journal of Advances in Social Sciences (IJASS) is an international, peer-reviewed journal, correspondence in the fields....... Read more >>>

RNI:                      
DOI:  

Popular Articles


Recent Articles




Tags