Author(s): सुधीर कुमार राय

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Address: डॉ0 सुधीर कुमार राय
एस¨शिएट प्र¨फेसर, समाजशास्त्र्ा-विभाग, उदय प्रताप स्वायत्तशासी महाविद्यालय, वाराणसी।

Published In:   Volume - 4,      Issue - 4,     Year - 2016


ABSTRACT:
संत आंडाल पूर्वमध्यकाल की प्रसिद्ध ‘आलवार’ संत थीं। दक्षिण भारत में वैष्णव भक्ति क¨ ल¨कप्रिय बनाने में ‘आलवार’ संत¨ं का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण य¨गदान था। ‘आलवार’ का अर्थ ह¨ता है- ‘अध्यात्मरूपी समुद्र में गहरा ग¨ता लगाने वाला व्यक्ति।’1 ये सन्त भगवान् नारायण के सच्चे प्रेमी उपासक थ्¨। इनके उपदेश¨ं की भाषा तमिल थी, जिसमें सरस गीत¨ं की रचना कर इन्ह¨ंने ‘भक्ति’ के माध्यम से एक जनचेतना का विकास किया। आलवार¨ं ने अपने जीवन से इस सत्य की घ¨षणा की कि भगवान् के दरबार में प्रवेश पाने का अधिकार सभी क¨ है। ब्राह्मण, शूद्र, पुरुष व स्त्र्ाी सभी बिना किसी भेद के इस व्यवस्था के अंग हैं।2 ये आलवार सन्त जिनकी संख्या 12 थी, समाज के विविध वगर्¨ं से सम्बद्ध थ्¨- नामालवार वल्लाल जाति का था, तिरूमंगइ कल्ल (लुटेरा) परिवार का था, कुलश्¨खर राजा, पेरियावलार ब्राह्मण एवं आंडाल स्त्र्ाी थी।3 श्री नाथमुनि ने इन सभी आलवार¨ं की रचनाअ¨ं (प्रबन्धन) का एक संग्रह तैयार किया, जिसका नाम ‘नालायिर प्रबन्धकम्’ है, ज¨ परमपवित्र्ा माने जाते हैं तथा वैष्णव वेद कहलाते हैं।4 यह संग्रह आलवार¨ं के अध्ययन के लिए प्रमुख स्र¨त हैं। दक्षिण भारत के धार्मिक जीवन में आज भी यह संत सामाजिक चेतना क¨ जागृत करने वाल्¨ मानवतावादी सुधारवादिय¨ं के रूप में स्मरण किये जाते तथा वैष्णव मंदिर¨ं में इनकी मूर्तियाँ भी स्थापित है। इन्हीं आलवार संत¨ं में एकमात्र्ा स्त्र्ाी संत आंडाल थी, जिसकी रचनाएँ न केवल कृष्ण के प्रेम की साक्षी है, बल्कि व्यापक समाज चिन्तन के भी उदाहरण हैं। प्रस्तुत श¨धपत्र्ा का उद्देश्य आंडाल के काव्य में उपलब्ध सामाजिक चेतना का विश्ल्¨षण करना है।


Cite this article:
डॉ0 सुधीर कुमार राय. संत आंडाल की सामाजिक चेतना. Int. J. Ad. Social Sciences. 2016; 4(4):189-192.


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