Author(s): महेन्द्र कुमार प्र्रेमी

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Address: महेन्द्र कुमार प्र्रेमी शोध-छात्र, तुल., धर्म,दर्शन एवं योग अ.शा., पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (छ.ग.) 492010

Published In:   Volume - 2,      Issue - 1,     Year - 2014


ABSTRACT:
शिक्षा मानव जीवन हेतु ज्ञान की वह कंुजी है जो संसार के समस्त बंद दरवाजे को खोलती है। शिक्षा मानव जीवन के दिशा एवं धाराएँ को बदल देती है। मानव सृष्टि की वह सर्वोत्तम कृति है जिसकी तुलना संसार के किसी भी जीव जन्तु, प्राणी से नहीं की जा सकती । ठीक उसी प्रकार शिक्षा मानव का वह बहुमूल्य आभूषण है जिसके साथ संसार के किसी भी वस्तु से तुलना नहीं की जा सकती। शिक्षा का सीधा व सरल अर्थ ’ सीखना-सीखाना‘ है। शिक्षा का मूल्य वही ज्यादा जानता है जिसको नही मिली। शिक्षा मानव के व्यक्तिगत विकास, सामाजिक विकास व राष्ट्रीय विकास हेतु एक सशक्त हथियार है, जहाँ की शिक्षा का स्तर जितना उच्च होगा वह देश, विकास की ऊँचाईयों पर उतने ही अधिक स्तर पर पहुँचेगा। जिज्ञासा और संसार की आश्चर्य कर देने वाली रहस्यात्मक तथ्यों ने मानव मन को सच्चाई की खोज हेतु प्रेरित किया। सत्य जानने की जिज्ञासा ने ज्ञान व रूचि को जन्म दिया परिणामस्वरूप विज्ञान तत्पश्चात् शिक्षा का जन्म हुआ। आज मानव शिक्षा रूपी ज्योति के आलोक में समस्त संसार के छिपे रहस्यों को ज्ञान के द्वारा प्रकाशित कर रहा है। शिक्षा वह प्रकाशमान ज्वाला है जो अज्ञानता के अंधेरे को मिटाकर सत्य को हमारे समक्ष प्रस्तुत करता हैं। शिक्षा वह क्रंाति का मशाल है जो समस्त मानव जाति को प्रकाशित करता है। शिक्षा मानव को स्वतंत्र करता है। शिक्षा मानव मस्तिष्क की वह शक्तियाँ है जो सूर्य की किरणों के समान है जब वह केन्द्रित होती है तो चमक उठती है फिर नव-सृजन, सृजन एवं सृजन की धाराएँ अनंत सृजन की ओर निरतंर बहती चली जाती है। शिक्षा का मूल्य वह निरक्षर व्यक्ति के लिए ऐसी संजीवनी है जैसे कि मृत के लिए अमृत। शिक्षा मानव के शक्ति व क्षमता को विश्व के विशाल मंच में प्रस्तुत करता है।


Cite this article:
महेन्द्र कुमार प्र्रेमी. शिक्षा का मूल्य: एक सामयिक विमर्श . Int. J. Ad. Social Sciences 2(1): Jan. –Mar., 2014; Page 64-68.


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