सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस और हस्त मुद्राओं की अवधारणा

 

ललित मोहन

(पीएचडी योग स्कॉलर) सैम ग्लोबल यूनिवर्सिटी, भोपाल, मध्य प्रदेश.

*Corresponding Author E-mail: lalitdangwal1111@gmail.com

 

ABSTRACT:

सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस की समस्या स्पाइन के सबसे उपरी भाग सर्वाइकल स्पाइन में होती है। इस स्थिति में गर्दन में स्थित रीढ़ की हड्डियों में लम्बे समय तक कड़ापन होने, गर्दन तथा कंधों में दर्द तथा जकड़न के साथ सिर में दर्द होने की स्थिति हो जाती है। यह दर्द धीरे-धीरे कंधे से आगे हाथों तथा बाँहों तक बढ़ जाता है और इससे सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस के लक्षण दिखते हैं। यह समस्या स्पाइन के सबसे उपरी भाग सर्वाइकल स्पाइन में होती है। हस्त-मुद्रा योग, शरीर को स्वस्थ रखने के लिए बहुत ही सरल चिकित्सा पद्धति है, जिसमें व्यक्ति को केवल एकाग्र बैठकर अपने हाथों की अंगुलियों के सहयोग से विभिन्न मुद्राएं-आकार बनाने होते हैं। जिससे शरीर के विशेष प्रकार के ऊर्जा केंद्रो को जागृत किया जाता है। आसन करने से जहाँ शारीरिक शक्ति मजबूत होती है वहीं मुद्राओं से शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की शक्तियों का विकास होता है। इनके नियमित अभ्यास से कई तरह के रोग दूर हो सकते हैं।

 

KEYWORDS: सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस, सर्वाइकल स्‍पाइन, गर्दन दर्द, हस्त-मुद्रा, मुद्रा चिकित्सा.

 


 


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सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस परिचय:

सर्वाइकल के क्षेत्र में 7 वेर्टेब्रा या कशेरुका होती है C1 से C7 जो आपस में डिस्क के साथ जुडी होती हैं। जिनके मदद से हम गर्दन को इधर-उधर घूमना, ऊपर-निचे घूमना आदि आसानी से करते हैं। सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस सर्वाइकल स्पाइन की एक सामान्य अपक्षयी स्थिति है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें गर्दन की हड्डियों, डिस्क और जोड़ों में बदलाव होता है तथा यह समस्या गर्दन के हिस्‍से में स्थित जोड़ों को प्रभावित करता है। इससे गर्दन के आस-पास के हिस्‍से में दर्द होने लगता है। आमतौर पर यह समस्‍या उम्र से संबंधित होती है क्‍योंकि सर्वाइकल स्‍पाइन की हड्डियों और कार्टिलेज समय के साथ कमजोर होने लगते है। हालांकि अन्‍य कई कारक जैसे गर्दन दर्द, किसी पुरानी चोट या स्वास्‍थ्‍य संबंधी जटिलताओं जैसे लंबे समय तक डेस्क पर काम, उठने-बैठने सोने की गलत पोजीशन या कठोर तकिए का इस्तेमाल और हड्डियों का अपनी जगह से खिसक जाना, मसल्‍स में मोच, गर्दन के स्पाइन में अर्थराइटिस, भारी वस्तु्ओं को उठाने का काम आदि से भी यह समस्‍या बढ़ सकती हैं।

 

सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस तब होता है जब गर्दन में कार्टिलेज, हड्डियां और लिगामेंट्स उम्र के साथ या उम्र से पहले खराब होने लगती हैं। पुराने दिनों में, सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस को बुढ़ापे से जोड़ा जाता था। लेकिन वर्तमान समय में यांत्रिक उपकरणों जैसे:- मोबाइल फोन या लैपटॉप आदि के अत्यधिक प्रयोग से और अनियंत्रित जीवन शैली के कारण, सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस किसी भी आयु वर्ग तक सीमित नहीं हैं।

 

हस्त मुद्रा का अर्थ और परिभाषा:

मुद्रा का सामान्य अर्थ आकृति, या कोई विशेष प्रकार की आकृति से है। हस्त मुद्रा, योग और भारतीय धर्मों में उपयोग किया जाने वाला हाथ का एक "चिह्न" है जो प्रतीकात्मक, अनुष्ठानिक और चिकित्सीय प्रयोग किया जाता है। यह "हस्त मुद्रा" शब्द संस्कृत शब्द हस्त से आया है , जिसका अर्थ है "हाथ," और मुद्रा, का अर्थ है "चिह्न" या "मुहर"।

 

हस्त मुद्रा का अभ्यास बैठकर, खड़े होकर भी किया जा सकता है, जब तक शरीर शिथिल हो। इन मुद्राओं का उपयोग अक्सर ध्यान में मन को केंद्रित करने और आसन अभ्यास के दौरान ऊर्जा के प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है। मुद्राएं कई प्रकार की होती हैं, प्रत्येक मुद्रा मानसिक केंद्रों और ऊर्जा चैनलों को साफ़ करके शरीर और मस्तिष्क पर एक विशिष्ट प्रभाव डालती है। इन मुद्राओं के सन्दर्भ में कहा जाता है किमुद्रओ से मूर्छित व्यक्ति को चैतन्य तथा रोगी व्यक्ति को स्वास्थ्य बनाने का समर्थ्य पाया जाता है। इनके कारण 'पूजा' "महापूजा" बन जाती है। मुद्रा रहित पूजन, अर्चन, जप, ध्यान, योग, प्राणायाम आदि की सभी क्रियाएं निष्फल मानी जाती हैं। मुद्राओं को मोक्ष प्राप्ति का सोपान भी माना गया है। इन मुद्रा चिकित्सा पद्धति की एक विशेषता यह भी है कि जहां एलोपैथिक दवाइयां महंगी है और जिनके साइड इफेक्ट भी बहुत हैं वहीं योग चिकित्सा पद्धति (हस्त मुद्रा) कम खर्चीली और आसानी से सुलभ भी है।

 

हस्त मुद्राओं की अवधारणा:

विज्ञान शरीर के कुछ खास हिस्सों में स्पेशल प्वाइंट होने की बात को स्वीकार करता हैं। विज्ञान मानता है कि, इन खास बिंदुओं पर यदि हल्का दबाव डाला जाए तो, बेचैनी, घबराहट, हार्मोन असंतुलन यहां तक कि फाइब्रोम्यालजिया (मांसपेशियों और जोड़ों में अकड़न, हाथ-पैरों में सुन्नपन या झुनझुनी होना) जैसी समस्याओं से भी राहत पाई जा सकती है। एक्युप्रेशर और एक्युपंचर जैसी थेरेपी विज्ञान की इसी मान्यता पर आधारित हैं।

 

यह समस्त ब्रह्मांड पंच तत्वों से निर्मित है हमारा शरीर भी प्रकृति के पाँच तत्वों से मिलकर बना है। कदाचित् कोई तत्व कम या ज्यादा होता है तो हमारा शरीर कई प्रकार के रोगों से ग्रसित हो जाता है। उन्हीं तत्वों को नियंत्रित करने के लिए हस्त-मुद्राओं का उपयोग करना सिखाया जाता रहा है। इनके अलावा हमारे शरीर में प्रतीत होने वाली कई अनजान घटनाओं को भी इन्हीं हस्तमुद्राओं का अवलंबन लेकर हम शारीरिक, मानसिक तथा सूक्ष्म शक्तियों का लाभ उठाकर आत्मउत्थान कर सकते हैं। हमारे हाथ की पाँचों अँगुलियाँ हमें पाँच तत्वों की तरफ़ इंगित करती हैं। अंगूठा - अग्नि तत्व को, तर्जनी अंगुली- वायु तत्व को, मध्यमा (बीच की अँगुली)- आकाश तत्व को, अनामिका - पृथ्वी तत्व को और कनिष्ठा अंगुली - जल तत्व को इंगित करती है। इन्हीं पाँचों अंगुलियों से हमारे शरीर में आई किसी प्रकटिस्थ विकृति को मुद्राओं के द्वारा इन तत्वों को सम कर हम स्वास्थ्य को प्राप्त कर सकते हैं। सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस के रोग में, रोगी में विकृत वायु अवरुद्ध रहती है उस विकृत वायु को दूर करने के लिए हमे मुद्रा की आवश्यक्ता पड़ती है। सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस की विकृत स्थिति के निदान के लिए महत्वपूर्ण मुद्राएँ निम्न इस प्रकार हैं:

 

1. वायु मुद्रा- तर्जनी अंगुली को अँगूठे की जड़ में लगाकर उसे अंगूठे से दबाने पर यह मुद्रा बनती है। बाकि सभी उँगलियाँ सीधी रहें। वायु मुद्रा वज्रासन में बैठकर करने से तुरंत और ज्यादा लाभ मिलता है

लाभ:

·        शरीर में वायु उत्पन्न होकर जिस जगह पर जमता है वहां वात के रोग होते हैं। इस प्रकार से वायु के सभी रोगों में वायु मुद्रा करने से लाभ मिलता है।

·        वायु के रोग जैसे कंपवात (पार्किंसन), साइटिका, सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस, घुटनों के दर्द में राहत मिलती है।

·        वायुजन्य गर्दन के रोग में अगर बायी और तकलीफ हो तो दाहिने हाथ से और दाहिनी हो तकलीफ हो तो बाएं हाथ से और अगर पूरी गर्दन का दर्द हो तो दोनों हाथ से वायु मुद्रा करके, मणिबंध से हाथ सर्कल में घुमाने से तकलीफ दूर होती है।

 

नोट: वायु मुद्रा शुरुआत में 5-10 मिनट से होकर अधिक से अधिक उच्च अभ्यास में 30 मिनट तक की जा सकती है।

2. अपान वायु मुद्रा- अपान मुद्रा और वायु मुद्रा मिलाकर अपान वायु मुद्रा बनती है। तर्जनी अंगुली को मोड़कर और अंगूठे के निचे की गद्दी पर लगा देवें मध्यमा एवं अनामिका को एक साथ मिलाकर एवं मोड़कर अंगूठे से स्पर्श करें और छोटी अंगुली सीधी रहें।

लाभ:

·        शरीर में कोई भी वायु और पेट के वायु में होते हुए, कोई भी दर्द में राहत मिलती है। एसिडिटी में राहत मिलती है।

·        किसी भी प्रकार के वात रोग में राहत मिलती है।

·        वात संबंधित कोई विशेष रोग जो वायु मुद्रा से ठीक ना हो तो इस मुद्रा से ठीक होते हैं।

·        इस मुद्रा से हृदय में घबराहट, हृदय की मंद गति, हार्टबीट्स का चूकना, पेट की वायु ह्रदय तक पहुंचकर तकलीफ दे तब, नियमित रूप से 15-15 मिनट सुबह-शाम करने से राहत मिलती है और ह्रदय शक्तिशाली बनता है। इस मुद्रा को मृत संजीवनी भी कहा जाता है।

 

मुद्राएं किस प्रकार कार्य करती हैं: हमारी अंगुलियो के पांचो वर्ग से अलग-अलग विद्युत धाराएं बहती हैं, इसलिए मुद्रा विज्ञान में जब अंगुलियो का आपसी स्पर्श करते हैं तब रुकी हुई या असंतुलित विद्युत बहकर शरीर की शक्ति को पुनः जगा देती है और हमारा शरीर निरोग होने लगता है ये अदभुत मुद्रा करते ही यह अपना असर दिखाना शुरू कर देती हैं

·        किसी भी अंगुली के अग्रभाग को अंगूठे के अग्रभाग से लगाते हैं तो उस अंगुली से संबंधित तत्व में विकृति सम हो जाती है।

·        यदि अंगूठे को किसी भी अंगुली के मूल भाग में मिला दे तो अंगुली संबंधित तत्व बढ़ने लगता है।

·        यदि किसी अंगुली के अग्रभाग को अंगूठे के प्रथम पोर पर दबा देते हैं तो उस अंगुली से संबंधित तत्व घटने लगता है।

 

इस प्रकार कई बीमारियों चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक हम हस्त मुद्रा द्वारा काफी हद तक ठीक कर सकते हैं।

 

निष्कर्ष:

अतः निष्कर्ष यह निकलता है कि जहां सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस की स्थिति के निदान के लिए एलोपैथिक दवाइयों के प्रयोग से अधिक समय लग सकता है वहीं इन दवाइयों के लगातार इस्तेमाल से साइड इफेक्ट भी देखे जा सकते हैं, जबकि योग चिकित्सा पद्धति इस उपचार के लिए सरल कारगर सिद्ध हो सकती है रोगोपचार में योग के आसन-प्राणायाम के साथ-साथ अगर हस्त मुद्रा का भी प्रयोग किया जाए तो साकारात्मक परिणाम देखे जा सकते हैं।

 

संदर्भ ग्रंथ:

1.       रोग और योग-डॉक्टर स्वामी कर्मानंद सरस्वती, प्रत्यक्ष मार्गदर्शन स्वामी सत्यानंद सरस्वती, योग पब्लिकेशन ट्रस्ट, मुंगेर बिहार।

2.       संपूर्ण योग विद्या-राजीव जैन त्रिलोक, मंजुल पब्लिशिंग हाउस, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली।

3.       योग साधना एवं योग चिकित्सा रहस्य- स्वामी रामदेव, दिव्य प्रकाशन पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार

4.       'प्राकृतिक स्वास्थ्य एवं योग' संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए-डॉ ब्रिज भूषण गोयल, स्टर्लिंग पब्लिशर्स प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली

5.       वृहद तांत्रिक मुद्रा विज्ञान-आचार्य पं राजेश दीक्षित, दीप पब्लिकेशन, कंचन मार्केट, हॉस्पिटल रोड, आगरा
6.       मुद्रा विज्ञान-नीलम प्रदीप संघवी, प्रकाशक संदीप संघवी, मेहता मार्ग अंधेरी (वेस्ट) मुंबई
7.       चित्र-Google.com

 

 

 

 

Received on 28.07.2023        Modified on 23.09.2023

Accepted on 12.11.2023        © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences. 2023; 11(4):223-225.

DOI: 10.52711/2454-2679.2023.00035