ग्रामीण उद्यमिता विकास संबंधी आर्थिक योजनाओं का विश्लेषणात्मक अध्ययन (मध्यप्रदेश के विशेष संदर्भ मे)

 

अनिल कुमार नायर1, डॉ. सोनल चौधरी2

1मध्यांचल प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, भोपाल (0प्र0)

2प्राध्यापक (वाणिज्य) मध्यांचल प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, भोपाल (0प्र0)

*Corresponding Author E-mail:

 

ABSTRACT:

उद्यमिता एक कौशल दृष्टिकोण एवं कार्यपद्धति है। साधारणतया उद्यमी को उसके कार्यों से ही परिभाषित किया जाता है। उद्यमी वह व्यक्ति है जो कुछ विशेष कार्य (उद्योगों, व्यवसाय, व्यापार सेवा) करने के लिये विचारों को जन्म देता है और उन विचारों केा क्रियान्वित करने के लिये अपनी तरफ से निश्चित तौर पर पहल और आत्मबल दिखाता है। जिससे यह विचार एक उद्यमशील कार्य का रूप धारण कर सके। राष्ट्र के आर्थिक विकास को बढ़ाने हेतु ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिये ग्रामीण उद्यमिता के अंतर्गत अनेक वर्ग पेशेवर संस्थाएं नियोजक वर्ग प्रवर्तक मिलकर उद्यमी का कार्य करते हैं।

 

KEYWORDS: ग्रामीण उद्यमिता-

 


 


प्रस्तावना: -

हमारा देष एक ग्राम प्रधान देष है तथा ग्राम प्रधान देष होने के कारण यहॉ की लगभग 72 प्रतिषत जनसंख्या गॉव में निवास करती है तथा प्रत्येक गॉव की विभिन्न प्रकार की समस्याएं होती है। इन सारी समस्याओं में से एक मुख्य समस्या बेरोजगारी तथा आर्थिक स्थिति की समस्या है, जिसके लिए वर्तमान में क्या बहुत पहले से अपने देष की सरकार षुरूआत से ग्रामीण क्षेत्रों की समस्या को लेकर प्रत्येक गॉव में गरीबी निवारण तथा आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने के लिए षुरू से ही प्रयास करती रही है। लेकिन पूर्ण रूप से इस समस्या का समाधान अभी तक नहीं हो पाया है।

 

इन आदि समस्याओं को ध्यान में रखते सरकार ने गरीब परिवारों के उत्थान के लिए तथा उनके जागरूकता पैदा करने के लिए अनेक प्रकार के जनजागरूकता के अभियान तथा विभिन्न प्रकार की योजनाओ का क्रियान्वन किया जा रहा है जिससे कि गरीब परिवारों की सामाजिक तथा आर्थिक एवं महिलाओं की स्थिति अधिक मजबूत को सके। इसके लिए ैण्भ्ण्ळण् के माध्यम से पुरूष/महिलाओं को जोड़ा जा रहा है जिससे कि समूह में जुड़कर आपसी भाई चारा तथा लिंग भेद तथा समूहों के माध्यम से छोटे-छोटे कुटीर उद्योग या व्यवसाय स्थापित करवाये जाते है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो सके और अपने परिवार का भरण पोषण आसानी के साथ कर सकें।

 

सामान्यतः महिलाओं की आर्थिक तथा सामाजिक एवं राजनैतिक रूप से पिछड़ी हुई थी तथा उनको समाज में लिंग भेद तथा अन्य सामाजिक दुर्बलताओं के कारण और महिलाओं की बेरोजगारी तथा उनकी सभी समान स्थितियों के ध्यान मे रखते हुए सरकार द्वारा अनेक प्रकार की महिलाओ से सम्बंधित योजनाओ का क्रियान्वयन किया जा रहा है।

 

शोध का क्षेत्र:-

संपूर्ण .प्र. शोध क्षेत्र के रूप मे लिया गया है। जिससे कि प्रदेश मे ग्रामीण उद्यमिता की वास्तविक स्थिति का अनुमान लग सके।

 

शोध का उद्देश्य:-

ग्रामीण उद्यमिता का क्षेत्र जितना विकसित होगा। उतनी ही पूंजी के विनियोजन का विस्तार होगा, ग्रामीण क्षेत्रो मे रोजगार बढ़ेगा। आय बढ़ने से उपभोग बढ़ेगा। इस प्रकार औद्योगिक विकास से उपभोग बढ़ेगा एवं औद्योगिक विकास से देश की अर्थव्यवस्था का विस्तार हो कर देश प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होगा। अतः ग्रामीण उद्यमिता के मार्ग मे आने वाली चुनौतियां एवं बाधाओं का अध्ययन करना। इस शोध का मुख्य उद्देश्य है। ताकि इनके समाधान के उपाय खोजे जा सके।

 

शोध प्रविधि:-

किसी भी शोध कार्य को उद्देश्यहीन एवं ज्ञानरहित नहीं कहा जा सकता है। इसके लिए कुछ निश्चित कारकांे से प्रेरित होकर ही निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये शोध-कार्य किया जाता है। ज्ञान के क्षेत्र में शोध कार्य अपरिहार्य है। वर्तमान युग में शोध या अनुसंधान का अत्यधिक महत्व है, क्योंकि किसी भी क्षेत्र से संबंधित तथ्यों का प्रमाणीकरण, नवीनीकरण, एवं सत्यापन अनुसंधान के द्वारा ही किया जा सकता है।

 

शोध कार्य में मध्यप्रदेश में ग्रामीण उद्यमिता विकास संबंधी आर्थिक योजनाओं से सम्बन्धित वास्तविक एवं विश्वसनीय आंकड़ों को प्राप्त करने के लिये प्राथमिक एवं द्वितीयक दोनों प्रकार के आंकड़ों को एकत्र कर पूर्ण किया गया है। प्राथमिक आकड़े स्वयं कार्य स्थल पर जाकर मूल स्रोतों एवं साक्षात्कार अनुसूची द्वारा एकत्र किये गये हैं। जबकि द्वितीयक आंकड़े मध्यप्रदेश में ग्रामीण उद्यमिता विकास संबंधी आर्थिक योजनाओं से संबंधित विभिन्न प्रकाशित-अप्रकाशित पुस्तकों, शोध पत्र-पत्रिकाओं, समाचार पत्रों, आदि से एकत्र कर प्रयोग किये गये हैं।

 

.प्र. मे ग्रामीण उद्यमिता की स्थिति:-

ग्रामीण उद्यमिता की स्थिति .प्र. के सभी जिलो मे संतोषजनक नही है। वास्तव मे ग्रामीण विकास के लिये आवश्यक है कि ग्रामीणो के जीवन स्तर मे वृद्धि की जाय एवं रोजगार के पर्याप्त संसाधनो का विकास किया जाए एवं ग्रामीण स्तर पर के लघु एवं कुटीर उद्योगों की स्थापना कर काम उपलब्ध कराया जाय। आज .प्र. के सभी जिलों मे उद्यमिता विकास मार्गदर्शक प्रकोष्ट संचालित है। जिसके अंतर्गत कृषि एवं उन पर आधारित उद्योग सौंदर्य प्रसाधन, प्लास्टिक कंप्यूटर, संचार उपकरण, मशीन एवं पुर्जे, पैकिंग सामग्री, औषधि रसायन, भवन सामग्री तथा विभिन्न वस्तुओं के निर्माण हेतु उद्यमिता विकास मार्गदर्शन केन्द्र से सलाह लेकर लघु मध्य तथा अथवा ऊंची पूंजी वाली उत्पादन इकाइयों के स्थापना के प्रयास किये जा रहे है। जिनमे काफी हद तक सफलता भी प्राप्त हेा रही है।

 

शासन द्वारा ग्रामीण उद्यमिता के विकास हेतु .प्र. मे अनेक योजनाये संचालित की जा रही है। जिनमे स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना, रानी दुर्गावती स्वरोजगार योजना, दीनदयाल स्वरोजगार योजना, ग्राम्या योजना स्वयं सहायता समूह, महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना आदि। इन सभी योजनाओं और एैसी ही अनेक अन्य येाजनाओं के माध्यम से .प्र. मे ग्रामीण उद्यमिता के विकास का प्रयास किया जा रहा है।

 

.प्र. मे ग्रामीण उद्यमिता के विकास हेतु निम्न उद्योग विभिन्न जिलों मे बहुतायात से स्थापित किये जा रहे है।  

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ग्रामीण उद्यमिता के विकास में बाधायें:-

उपरोक्त योजनाओं और ऐसी ही अन्य अनेक योजनाओं के माध्यम से .प्र. ग्रामीण उद्यमिता के विकास के प्रयास किये जा रहे है किन्तु इसमें अनेक बाधायें एवं चुनौतियॉ भी सामने रही है। जिसमंे कार्य से जुड़ा हुआ जोखिम, सफलता-असफलता की अनिश्चितता के साथ - साथ अनेक अन्य चुनौतियां है। जैसे:-

1. गांवों मे पहुंचमार्ग का अभाव एवं उपलब्ध सड़कों की दयनीय स्थिति।

2. उद्यम हेतु पर्याप्त जल का अभाव, स्वच्छ पेयजल, की कमी।

3. प्रदेश के सभी गांवों मे विद्युतीकारण की दयनीय स्थिता जिन गांवों मे विद्युत सुविधा है भी वहां पर भी 24 मे से 18 से 20 घंटे तक विद्युत आपूर्ति मे अत्याधिक कमी।

4. वित्त की समस्या

5. उच्च शिक्षा की कमी।

6. आवश्यक चिकित्सा सेवाओं का अभाव।

 

जब तक उक्त बाधाये विद्यमान रहेगी, ग्रामीण उद्यमिता का विकास संभव नही है।

 

सुझाव:-

उक्त बाधाओं केा दूर करने के लिये सुझाव निम्नानुसार हैः-

1. देश के समुचित एवं समान विकास के लिये आवश्यक है, कि केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकार के समन्वय से गांवों मे पहुंच मार्गो का निर्माण कराया जाय। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के अंतर्गत सड़क निर्माण कार्य को तीव्र गति से संपन्न कराया जाय।

2. अधिकांशः गांवो मे पेय जल काफी दूर से लेकर आना पड़ता है। जिससे लोगों केा काफी असुविधा का सामना करना पड़ता है। एैसी जगहो पर ग्रामीण उद्यमिता का विकास भी संभव नही होता। अतः शासन को चाहिए कि एैसे गावों में जल की समस्या के निराकरण के लिये विशेष योजना बनाकर लागू की जाय। जिससे की जल की समस्या का निदान हो सके। एैसा होने पर ऐसे गांवों में उद्यमिता को प्रोत्ःसाहन मिलेगा।

3. .प्र. के अधिकांशतः दूरस्थ गांवों मे आज स्थिति यह है कि कुल 2 से 4 घंटे ही बिजली रहती है। ऐसी स्थिति मे उद्योग स्थापित करना अत्याधिक दुष्कर कार्य हो जाता है। अतः गांवों मे बिजली की आपूर्ति हेतु शासन केा नये थर्मल पावर स्थापित करने चाहिए। जिससे दूरस्थ क्षेत्रों मे बिजली की पूर्ति बढ़ाई जा सके, ताकि वहाँ पर उद्यमी उद्योग स्थापित करने के लिये प्रेरित हों।

4. वित्त की समस्या से निपटने के लिये जेा लोग ग्रामीण क्षेत्रों मे उद्योग स्थापित करना चाहते हेै। उनको बैंको से कम व्याज दर पर ऋण उपलबध कराया जाना चाहिए।

5. राज्य सरकार को चाहिए कि गांवो मे शिक्षा एवं चिकित्सा सेवाओं मे वृद्धि करे। इस हेतु ग्रामीण स्वयं भी एक जुट होकर जनभागीदारी के माध्यम से अपने गांवों मे शिक्षा एवं चिकित्सा की सुविधाओं मे वृद्धि कर सके।

 

निष्कर्ष:-

निष्कर्ष रूप मे हम कह सकते है, कि यदि सड़क, बिजली, पानी एवं वित्त जैसी आधारभूत सुविधायंे यदि ग्रामीण क्षेत्रों मे उपलब्ध करा दी जाय तो प्रदेश के दूरस्थ गांवों मे भी उद्यमी उद्यम स्थापित करने मे नही हिचकिचायेंगे। यदि संपूर्ण देश मे लघु उद्योगों का विकेन्द्रीकरण कर दूरस्थ गावों मे लघु उद्योगों की स्थापना को बढ़ावा दिया जाय तो देश के औद्योगिक, आर्थिक एवं सामाजिक विकास मे तीव्र गति से वृद्धि होगी और हमे विश्व की विकसित अर्थव्यवस्थाओं के समक्ष खड़े हो सकेगे। इसके लिये तीव्र गति से ग्रामीण उद्यमिता का विकास किया जाना अत्यधिक आवश्यक है।

 

सन्दर्भ ग्रंथ सूची

1-     पन्त डी.सी. - भारत में ग्रामीण विकास 2009, त्रिपोलिया कालेज बुक डिपो जयपुर।

2-     गुप्ता, ओम प्रकाश एवं गुप्ता जी.पी. एवं कश्यप, एस.पी. - लघु उद्योग एवं महिला उद्यमिता वर्तमान स्थिति और विश्लेषण

3-     त्रिपाठी, एन.सी - उद्यमिता विकास रमेश रमेश प्रकाशन मेरठ

4-     उद्यमिता समाचार पत्र - उद्यमिता विकास केन्द्र .प्र. सेडमैप जहांगीराबाद भोपाल

5-     स्वरोजगार एवं मार्गदर्शन श्रम मंत्रालय भारत सरकार जबलपुर।

6-     समूह प्रबंधन एवं उद्यमिता विकास केन्द्र भोपाल।

7-     फडिया बी.एल. 2005., लोक प्रकाशन एवं शोध प्रविधि, साहित्य भवन पब्लिकेशन, आगरा

8-     गंगराडे के.डी. 2008., गांधी के आदर्श और ग्रामीण विकास, राधा पब्लिकेशन, दरियागंज, नई दिल्ली

9-     गर्ग डी.पी. 1993. समन्वित ग्रामीण विकास एवं सहकारिता, शिवा प्रकाशन, इन्दौर

10-   गुप्ता एम.एल. एवं शर्मा डी.डी. 2007., भारतीय ग्रामीण समाजशास्त्र, साहित्य भवन पब्लिकेशन, आगरा

11-   गोयल अनुपम 1993. भारतीय अर्थव्यवस्था, शिवलाल अग्रवाल एण्ड कम्पनी, इन्दौर

 

 

 

 

Received on 14.08.2023         Modified on 23.08.2023

Accepted on 10.09.2023         © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences. 2023; 11(3):181-184.

DOI: 10.52711/2454-2679.2023.00027