कंधेरो की पहचान के विरुद्ध चुनौतियां (भावनगर क्षेत्र के विषय में)

 

जयदेवसिंह बी. रायजादा

असिस्टेंट प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग, क्रांतिगुरु श्यामजी कृष्णवर्मा कच्छ यूनिवर्सिटी,

भुज-कच्छ, गुजरात.

*Corresponding Author E-mail:

 

ABSTRACT:

गुजरात में अनेक बंजारा समूह राजस्थान में से स्थानांतरण करके आए थे। उनमें से हर एक समूह ने अलग-अलग व्यापार को अपनाया उसके आधार पर उनको पहचान मिली। जिसके आधार पर से बंजारे में से गौण जातियां अस्तित्व में आई। मूल बंजारे लोग ऊंटवाल कर उसके ऊपर माल और सामान का वाहन और ऊंट की लेनदेन  करके अपना गुजारा करते थे। गधे पर मिट्टी और सामान का वाहन और खुदाई करके गुजारा करते बंजारे ओढ़ के रूप में पहचाने जाते थे। अंकित खेल द्वारा पैसे कमा कर गुजारा करने वाले लोग गोरिया कहलाए। लोहे के बर्तन ठीक करने वाले लोग लोहारिया कहलाए। मजदूरी करते कंधे बैठ के रूप में पहचाने जाते जबकि कंदी बनाकर बेचने वाले लोग कंधेर के नाम से पहचाने जाते। यह कंधील लोग रायण और शीशम जैसे पेड़ की लकड़ी में से और पशुओं की सिंग में से एक कंधी  बनाकर गांव और शहरों में बेचने वाले के रूप में कैरी करके उसका व्यापार करते थे। साथ ही संख सीप कोरिया जैसे और बास में से बनाई हुई कहीं हस्तनिर्मित चीजों का व्यापार करते थे

 

KEYWORDS: विभाजित, निश्चित प्रदेशों, लोहारिया, गोरिया, बंजारे, सौंदर्य, कंधेर.


 


 

प्रस्तावना: -

भारतीय समाज अलग-अलग विभागों में विभाजित है। धर्म वर्ण जातिमें विभाजित हुआ है। भारतीय समाज का अतीत देखें तो प्राचीन समय में चार वर्णों में बटा हुआ था। मध्य युग के दौरान 4 वर्णन अनेक जातियों में विभाजित हुए उसमें से ज्यादातर जातियों को व्यवसाय के आधार पर पहचान मिली। व्यवसाय के आधार पर पैदा हुए इस जातियों में कुछ एक निश्चित प्रदेशों में स्थाई हो सकी नहीं। व्यापार के लिए वह लोग भटकती जिंदगी जी रहे थे।

 

मध्य युग के पूर्वार्ध समय में राजस्थान में पशुओं का पालन करने वाली जाति को बंजारा के रूप में पहचान मिली। पशुओं के समूह को उस समय बंजार कहा जाता था। उस पर से बंजारे शब्द इस्तेमाल हुआ बंजारे लोग अपने पशुओं के लिए घास चारा पाने के लिए स्थलांतर करते थे। फल अंतरण के दौरान देश के विभिन्न प्रदेशों में से उनके कई समूह अलग-अलग प्रकार की कलाए और कसब सीखे और कला कसब में निपुण हुए। लोगों ने उसे व्यापार के रूप में अपनाया उनकी कशबी का व्यापार निश्चित प्रदेशों में फिर अथवा स्थाई नहीं था।

 

अभ्यास का विषयवस्तु: -

तत्कालीन समय में कंघेर लोगों के व्यवसाय में बदलाव आया है कंधी का स्थान प्लास्टिक की कंधीने लिया इसलिए कंधे बनाने का और बेचने का व्यापार बंद हो गया है फिर भी अब तक उन्होंने फेरीवाले के रूप में फिरकर चीजें बेचने का धंधा टिकाए रखा है। लेकिन अब कंधे के स्थान कटलरी चीजों, आधुनिक सौंदर्य प्रसाधन बेचने का व्यापार करके और बांस की चीजें बेचकर गुजारा करते हैं। जबकि कहीं कंधेर परिवार दूसरे व्यापार का अर्थाेपार्जन की प्रवृत्ति कर रहे हैं। तत्कालीन समय में तीव्र बने सामाजिक बदलाव के प्रमुख प्रभाव के परिणाम रूप अंधेर लोगों में व्यापारिक बदलाव हो रहा है।

 

कंधेर समुदाय में व्यापारिक बदलाव और स्थिर भटकती व्यापारिक जिंदगी के परिणाम रूप कंधेरों के लिए उनकी मूल पहचान बनाए रखनेका सवाल पैदा हुआ है। उनकी मूल पहचान के लिए कई चुनौतिया तत्कालीन समय में सर्जन हुई है। आधुनिकीकरण,पाश्चात्य करण वैश्वीकरण जैसी प्रक्रिया के प्रभाव के रूप में भारतीय समाज में सांस्कृतिक बदलाव की प्रक्रिया तीव्र बनी है। यह तीव्रता से बदल रही स्थानिक  संस्कृति के परिणाम से कंधेरों के लिए बदलाव के साथ अनुकूलन की जरूरत उठ रही है। जो कंधेरों के लिए प्रमुख चुनौती रूप समस्या बनी है।

 

गुजरात राज्य के प्रमुख तीन भाग है सौराष्ट्र कच्छ और ठेठ गुजरात। यह तीनों प्रदेशों में कंधेरों की छोटी-छोटी आबादी गांव में और शहरों में बसी हुई है प्रमुख रूप से उनकी आबादी गांव अथवा शहर के छोर पर पाई हुई है।

 

सौराष्ट्र के भावनगर जिले के प्रमुख शहर भावनगर के नजदीक फुलसर गांव पर दो कंधेरो की आबादी बसी हुई है विकसित शहर भावनगर का फैलाव बढ़ते हुए फुलसर गांव भावनगर शहर म्युनिसिपालिटी की सीमा में समाविष्ट हुआ है जब कि भविष्य में सीदसर गांव भी म्युनिसिपालिटी की सीमा में समाविष्ट किया जाए ऐसी पूर्ण संभावना सर्जन हुई है। पहली आबादी में 64 परिवार बसते हैं जबकि दूसरी आबादी में 42 परिवार बसते हैं। यह दोनों शहर के फुलसर क्षेत्र में है। जबकि तीसरा सिदसर गांव पर आई आबादी में 72 परिवार बसे है इन तीनों आबादी के कुल मिलाकर 1 से 9 परिवार बसते हैं।

 

भावनगर शहर की सीमा में आई उपर्युक्त तीन कंधेर की आबादी परंपरागत व्यापार हस्तकला हुनर द्वारा बनाई चीजें बेचने का था उसमें कंधी बनाकर बेचने का व्यापार तकरीबन सभी परिवार करते थे इस कारण उनकी जाति का नाम कंधेर पड़ा।

 

तत्कालीन समय में सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया के प्रभाव रूप परिणाम से कंधेरों की संस्कृति के परंपरागत आयामों और व्यवसाय में बदलाव रहे हैं। साथ ही कंधेरोने अपनी परंपरागत संस्कृति के कहीं आयामों कायम रखे हैं। उनका परिधान और व्यवसाय पूरे बदल रहे हैं। जबकि परंपरागत रीत रसम में कम मात्रा में बदलाव आया है। साथ ही जाति के ऊपर मापदंड के रूप प्रभुत्व धारण करता हुआ ज्ञाति पंचायत ने अब तक कंधेरों पर कठोर सामाजिक नियंत्रण बनाए रखा है.

 

तत्कालीन समय में बदलाव का प्रभुत्व तीव्र बनने के कारण कंधेरों की पहचान के विरुद्ध चुनौतियां खड़ी हुई है। उनकी मूल पहचान के मुताबिक वह मध्ययुग में राजस्थान के क्षत्रिय थे उसके बाद भटकती जिंदगी जीने से वह बंजारे कहलाए। और उनके बाद व्यवसाय के आधार पर उन्हें कंधेरो के रूप में पहचान मिली बदलती जाति की पहचान के बीच भी उन्होंने अपनी मूल वंशीय पहचान को टिकाए रखा है। जबकि जाति की पहचान बदलती रही है। उनके भटकते जीवन के परिणाम से उनकी मूल संस्कृति को टिकाए रखना मुश्किल बना और सांस्कृतिक बदलाव होने लगा। साथ ही उनके व्यवसाय पीढ़ी दर पीढ़ी बदलते रहे इस बदलती सामाजिक व्यवस्था और उनकी संस्कृति ने कंधेरों की पहचान के विरुद्ध चुनौतियां खड़ी की है।

 

संशोधन योजना और पद्धति: -

. अभ्यास के हेतु: -

. कंधेरों की परंपरागत पहचान विरुद्ध की चुनौतियां जांचना।

. अंधेरों की तत्कालीन पहचान विरुद्ध की चुनौतियां जांचना।

 

. अभ्यास की अवधारणाए: -

. कंधेरों की तत्कालीन और परंपरागत ऐसे दोनों पहचान टिकी रही है।

. कंधेर उनकी पहचान बनाए रखने का मनोबल आन रखते हैं।

 

. अभ्यास का महत्व: -

. समाज में निर्बल वर्ग के बारे में वैज्ञानिक अभ्यास की तत्कालीन समय में जरूरत है। क्योंकि उसके द्वारा ही समाज के निर्बल अंगों की पहचान हो सकती है और उसके सामाजिक पिछड़ेपन के संदर्भित कारण जान सकते हैं।

. तत्कालीन समय में सामाजिक बदलाव के परिणाम से समाज के निर्बल वर्ग के लिए नई चुनौतियां का सर्जन हुआ है। वैज्ञानिक अभ्यास इस चुनौतियों  पहचानने के लिए उपयोगी होगी।

 

. अभ्यास विषय की अगत्यता दृपसंदगी के कारण: -

. कंधेरो के ऊपर वैज्ञानिक पद्धति से हुए अभ्यासो की मात्रा नहींवत है इसलिए यह अभ्यास पसंद किया गया है।

. तत्कालीन सामाजिक बदलाव के प्रवाहने कंधेर जाती पर चुनौती रूप प्रभाव किया है जिसके परिणाम से यह विषय पसंद किया गया है।

 

. माहिती एकत्रीकरण की रीत: -

क्षेत्रीय संशोधन के दौरान अभ्यास क्षेत्र में जाकर स्थान को लक्ष्य में रखकर, क्षेत्रीय अवलोकन, व्यक्ति को लक्ष में लेकर, प्रशिक्षित अवलोकन, अवलोकन कर्ता की संख्या को देखते हुए वैज्ञानिक अवलोकन, अवलोकनकर्ता की भूमिका को नजर में के सामने रखकर अलिप्त निरीक्षण का प्रयोग किया जाएगा।

 

वैज्ञानिक प्रयुक्ति के अनुसार मुलाकात तालिका वहीं से ही गौण माहिती और संख्यात्मक माहिती का उपयोग किया जाएगा।

 

. व्याप विश्व और नमूने की पसंदगी: -

इस संशोधन के लिए गुजरात राज्य के भावनगर जिले को व्यापक विश्व के रूप में निश्चित किया गया है। भावनगर जिले के प्रमुख शहर भावनगर के नजदीक कंधेर आबादी बसी हुई है उनमें से अभ्यास के लिए आबादी में से संशोधन के लिए जरूरी नमूना पसंद किया गया है। इस में से आबादी शहर के फुलसर क्षेत्र में आई है तीसरी आबादी जो शहर के नजदीक सिदसर गांव में आई है।

 

अभ्यास का विश्लेषण: -

अभ्यास के दौरान मिली हुई प्राथमिक माहिती देखे तो आबादी नंबर में से ३४ ,आबादी नंबर में से २५ और में से ४० ऐसे कुल १०० परिवारों की मुलाकात तालिका द्वारा माहिती प्राप्त की गई है उत्तर दाता में से ७२ परिवार के सदस्य राठौर १० परिवार के सदस्य चौहान और १८ परिवार के सदस्य परमार वंश के थे उत्तर दाता के रूप में ८२ परिवार में से पुरुष सदस्य ने और १८ घर में से स्त्री सदस्य ने उत्तर दिया था।

जाति के पहचान किन के ऊपर से बने इसके पीछे की प्रमुख बदौलत जांचने से १०० उत्तरदाता ने कंधेरों के व्यवसाय के ऊपर  से कंधेर जाती बनी है ऐसा निर्दिष्ट किया है।

 

तत्कालीन समय में उनका कंधेर के रूप में व्यवसाय करते परिवारों के क्रमांक जांचने से एक भी परिवार कंधेर का व्यवसाय करता दिखाई नहीं दिया।

 

भविष्य में एक कंधेरों की परंपरागत पहचान टिक सकेगी ? ऐसे प्रश्न के जवाब में ८८ लोगों ने ना जबकि १२ लोगों ने हां कही थी।

 

क्षत्रिय के रूप की परंपरागत पहचान लुप्त होने के प्रमुख बदौलत जांचने पर ५८ लोगों ने कहा कि व्यवसाय बदलने से क्षत्रिय के रूप मूल पहचान लुप्त होने की पूर्ण संभावना है बनी हुई है। जबकि ४५ लोगों ने कंधेर के रूप में नई पहचान मिलने से, जबकि १२ लोगोंने भटकती जिंदगी का, जब २३ लोगों ने बच्चे अपनी परंपरागत पहचान भूल जाएंगे ऐसा कारण उत्तर के रूप में दिया था। उत्तरदाता ने सामाजिक बदलाव में लोगों ने कंघेर के रूप की पहचान से सरकारी लाभ मिल सकते हैं इसलिए, जबकि उत्तरदाताने राजपूतदृक्षत्रिय के रूपमें मूल पहचान बनानेमें कंधेरों की नई पीढ़ी को पूरी रुचि नहीं है ऐसा कारण निर्दिष्ट किया था। तत्कालीन समय के कंधेर के रूप की पहचान लुप्त होने की संभावना होने से उत्तरदाताने कंधेर के रूप की पहचान टिक सकेगी, बल्कि लोगों ने कंधेर की पहचान के विरुद्ध चुनौतियां सर्जन हुई है ऐसा कहा था।

 

कंधेरो की पहुंचान लुप्त होने के पीछे का कारण जांचने से हां कहने वाले तीनों उत्तरदाता ने कंधी का व्यवसाय करते कंधेरोने और दूसरे विविध व्यवसाय को अपनाया इसी कारण उनकी कंधेर के रूप की पहचान विरुद्ध चुनौतिया सर्जन हुई है ऐसा लोगों ने निर्दिष्ट किया गया है।

 

माहिती का विश्लेषण: -

कंधेरों ने उनका पुराना व्यवसाय कंधी बनाने और बेचने का व्यवसाय के बारे मे जानने को मिला है कि सभी परिवारोंने अपना पुराना व्यवसाय बदल कर नया व्यवसाय अपनाया है।

 

फेरीवाले के रूप में फिरकर व्यवसाय करते परिवारों की संख्या जांच के ३४ परिवारों द्वारा कंधी को बेचना और ६६ लोगोने अन्य प्रसाधनिक चीजों का व्यवसाय अपनाया है।

 

भविष्य में क्षत्रिय के रूप परंपरागत पहचान टिक पाएगी कि नहीं यह जांचते उत्तरदाता के उत्तर के मुताबिक भविष्य में क्षत्रिय के रूप परंपरागत पहचान लुप्त बन जाएगी ऐसा उन्होंने अभिव्यक्त किया था। जबकि १२ लोगों ने क्षत्रिय के रूप में पहचान टिक पाएगी ऐसा अभिव्यक्त किया था।

 

क्षत्रिय के रूप की  परंपरागत पहचान लुप्त होने के पीछे जिम्मेदार कारण के बारे में अभिप्राय लिया तो ४८ उत्तरदाताओंने व्यवसाय बदलने से, ४५ उत्तरदाताओं ने कंधेर के रूप पहचानने से, १२ उत्तरदाताओंने भटकती जिंदगी की बदौलत, २३ उत्तदाताओने बच्चे परंपरागत पहचान निभा नहीं सकेंगे, २८ उत्तरदाताओंने सामाजिक बदलाव आने से नई पीढ़ी को अपनी परंपरागत पहचान निभाने में रुचि नहीं है, उत्तरदाताओं ने कंधेर के रूप में पहचान से सरकारी लाभ पा सकते हैं इसलिए और ७६ उत्तर दाताओं ने सामाजिक बदलाव के प्रभाव के कारण क्षत्रिय के रूप की पहचान भविष्य में लुप्त होगी ऐसा ८८ परि (4 चउए 11/07/2023) क्त  टपदंल च्ंजमसरू अभ्यास तले के परिवारों को उनकी कंधेरो के रूपमे तत्कालीन समय की पहचान भविष्य में टिक पाएगी कि नहीं ? ऐसा प्रश्न पूछने से ९७ उत्तरदाताओंने उनकी तत्कालीन समय की पहचान भविष्य में लंबे समय तक टिक पाएगी ऐसा अभिप्राय व्यक्त किया जबकि उत्तर दाताओने उनकी कंधेर के रूप में पहचान बदलने की संभावना निर्दिष्ट किया है।

 

अभ्यास में समाविष्ट सभी उत्तरदाताओं को कंधेर के रूप में पहचान टीकी रहने के पीछे का प्रमुख कारण के बारे में अभिप्राय पूछा तो सभी उत्तर दाताओंने अलग-अलग जवाब दिया था। जिसमें से २४ उत्तर दाताओं ने तत्कालीन समय में सरकारी किताबों में कंधेर शीशनामा पंजीकृत होने से, ६८ उत्तरदाताओंने समाजमें एक कंधेर के रूप में पहचान स्थापित होने से उत्तर दाताओंने कंधेरों के पिछड़ेपन के रूपमें लाभ मिलने के कारण कंधेर के रूप में उनकी पहचान भविष्य में टिके रहने के पीछे का प्रमुख कारणके बारे में अभिप्राय दिया था।

 

साथ ही बाकी उत्तरदाताने अभिप्राय दिया कि कंधेरोको तत्कालीन पहचान लंबे समय तक नहीं रहेगी उनके पीछे सदस्यों ने अपना अभिप्राय अभिव्यक्त किया कि कंधेरो का व्यवसाय बदलनेसे और ने अभिप्राय अभिव्यक्त किया कि उनका जातीय गौरव उनके पिछड़ेपन से नष्ट होता है इसलिए उनकी मूल तत्कालीन पहचान नहीं रहेगी ऐसा अभिप्राय व्यक्त किया है।

 

अध्ययन निष्कर्ष: -

1-    कंधेरो की मूल पहचान क्षत्रिय के रूप में थी उसके बाद राजस्थानमें राजपूत और उसके बाद स्थानांतर और ऊंट का व्यवसाय करते बंजारे और फिर कंधेरा के रूप में पहचान वह लोगों ने पाई थी। आबादी के बड़ी उम्र के लोगों के पास से मिली गई माहिती पर से कंधेरों की मूल पहचान और बदलती पहचान के बारे में माहिती मिली थी।

2-    कांधेरोका मूल वतन राजस्थान था। वहीकी राजपूत क्षत्रिय के रूप में मूल पहचान अब तक कंधेरोंने  निभाए रखी है। तत्कालीन समय में सामाजिक बदलाव के प्रभाव तले उनकी मूल पहचान बदल रही है। साथ ही भविष्य में उनकी मूल पहचान संपूर्ण लुप्त होगी ऐसा माहिती जांचने जानने को मिला है।

3-    भारत में क्षत्रिय उच्च ज्ञाति गिनी जाती है जबकि कंधेरोको निम्न ज्ञाति में गिना जाने से उनका मूल गौरव गंवाते थे ऐसी अभिव्यक्ति अंधेरों के परिवार करते हैं अवलोकन पर से इस बारे में जानने को मिला है।

4-    कंधेरों की ऐतिहासिक समयावधि दौरान अविरत बदलती पहचान के परिणाम से सरकारी दस्तावेजमें प्रारंभ के नाम पंजीकरण के समय उनको कौनसी ज्ञाती के रूप में पहचाने यह प्रश्न खड़ा था साथ ही उनको उच्च ज्ञाती गिने की निम्न ज्ञाती वह प्रश्न सर्जन हुआ था। यह सभी सवालों कंधेरो के लिए चुनौती के रूप में थे ऐसी माहिती जांचते समय जानने को मिला है।

5-    कंधेरों का व्यवसाय और विशेष संस्कृति उनकी पहचान के रूप में थे तत्कालीन समय में सामाजिक बदलाव होने से भविष्य में कंधेर के रूपकी तत्कालीन समय की ज्ञांति की पहचान पर भी बदलाव का प्रभाव पड़ेगा ऐसा मुलाकात तालिका द्वारा एकीकरण की गई माहिती की जांच से जानने को मिला है।

6-    कंधेरो की तत्कालीन पहचान के विरुद्ध तत्कालीन समय में कोई विशेष चुनौतियां की जानकारी नहीं मिली है। अवलोकन और मुलाकात से एकीकरण की गई माहिती पर से इसके बारे में जानकारी मिली है।

7-    कंधेरों को मिलते निम्न ज्ञांती के रूप में सरकारी लाभ अब तक एक भी कंधेर परिवार को मिल सका नहीं क्योंकि वह लोग शैक्षणिक रूप से और आर्थिक रूप से भी पिछड़े है। उनका यह पिछड़ापन आरक्षण के लाभ पाने के लिए चुनौती बन पड़ा है। ऐसी माहिती जांचने से जानकारी मिली है।

8-     अभ्यास की अवधारणा संपूर्ण सच्ची हो नहीं पाई उनकी परंपरागत पहचान लुप्त हो रही है जबकि तत्कालीन पहचान लंबे समय तक टिकी रहेगी। ऐसी माहिती पर से निष्कर्ष देखने को मिला है। वार के उत्तर दाता का अभिप्राय रहा है।

 

 

 

 

Received on 13.07.2023        Modified on 16.08.2023

Accepted on 10.09.2023        © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences. 2023; 11(3):176-180.

DOI: 10.52711/2454-2679.2023.00026