हिन्द महासागर में भारत-अमेरिका- चीन के त्रिकोणात्मक सम्बन्धों का एक अध्ययन

 

Naveen Singh

Assistant Professor Department of Political Science, Baiswara Degree College, Lalganj, Raebareli (UP). (Enrolled as Research Scholar in Department of Political Science,

University of Allahabad, Prayagraj, U.P.)

*Corresponding Author E-mail: naveensingh.singh92@gmail.com

 

ABSTRACT:

व्यक्तिगत सत्याग्रह में ब्रिटिश सरकार ने जो नीति अपनाई उसके अनुसार समाचार पत्रों पर प्रतिबंध सूचनाओं का आदान-प्रदान तथा भारत रक्षा कानून की धाराओं के अधीन दंडित किए जाने की प्रक्रियाओं के परिणाम ब्रिटिष शासन के लिए लाभदायक रहे। व्यक्तिगत सत्याग्रह से संबंधित समाचारों के प्रकाशन पर प्रतिबंध लगाये जाने से समाचार पत्रों का प्रकाशन बंद हो गया। मध्यप्रांत से प्रकाशित होने वाले अधिकांश समाचार ने ब्रिटिष शासन की नीतियों का अनुसरण करते हुए सत्याग्रह से संबंधित समाचारों का प्रकाशन नहीं किया। यद्यापि यह नीति जनता के भाषण तथा अभिव्यक्ति को व्यक्तिगत स्वंतत्रता के विरोधी थी परंतु भारत जैसे देश मंे जो उस समय ब्रिटिश साम्राज्यवाद के अधीन था यह अप्रत्याशित नहीं था। महात्मा गांधी जी ने अपने समाचार पत्र हरिजन का प्रकाशन बंद कर शासन की इस नीति का विरोध अवश्य किया परंतु अधिकतर समाचार पत्र सरकार को सहयोग प्रदान करते रहे। इसी सूचनाओं के आदान-प्रदान की नीति ने ब्रिटिश सरकार को बेहतर स्थिति में ला दिया। केन्द्रीय गृह विभाग के अधीन कार्यरत सेंट्रल इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारी कांग्रेस की योजनाओं तथा गतिविधियों की जानकारी समय से पूर्व प्राप्त कर केन्द्रीय शासन को प्रेषित करते थे।

 

KEYWORDS: स्ट्रिंग आफ पर्ल्स, वन बेल्ट वन रोड, क्वाड, मालाबार नौ सैन्य अभ्यास।

 


 


प्रस्तावना -

हिंद महासागर दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा जलाशय है, इसकी विशिष्ट भूस्थैतिक विशेषता है कि यह तीन तरफ से जमीन से घिरा हुआ है। यह संसार के 20.6 प्रतिषत समुद्री क्षेत्र में फैला है और 47 राज्य के तट इसके जल को छूते हैं। यहां विश्व की एक तिहाई जनसंख्या निवास करती है। इसका उत्तर, पूर्वी पश्चिमी भाग क्रमशः एशिया, पूर्वी अफ्रीका तथा दक्षिण पूर्वी एशिया वह आस्ट्रेलिया से घिरा है। इस महासागर के प्रमुख संघटक-लाल सागर, अरब सागर, फारस की खाड़ी, बंगाल की खाड़ी, मोजांबिक जलमार्ग तथा वृहद ऑस्ट्रेलियन खाड़ी है। तीन महाद्वीपों अफ्रीका एशिया तथा आस्ट्रेलिया से घिरा होने के कारण हिंद महासागर का भू राजनीतिक एवं आर्थिक महत्व बहुत अधिक है।

 

विभिन्न आर्थिक, राजनीतिक एवं रणनीतिक कारणों से उत्पन्न विशेषताओं के कारण हिंद महासागर केवल क्षेत्रीय देशों के लिए ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्व के लिए विशेष महत्व रखता है। हिंद महासागर खाद्य पदार्थ, खनिज ऊर्जा का अक्षय स्त्रोत माना जाता है। यह संपन्न प्राकृतिक संसाधन क्षेत्र है। हिंद महासागर में विश्व का दो तिहाई तेल संसाधन है, 60 प्रतिषत यूरेनियम, 40 प्रतिषत सोना विश्व आपूर्ति का 98 प्रतिषत हीरा उपस्थित है। फारस की खाड़ी का क्षेत्र विश्व का मुख्य तेल उत्पादनकर्ता क्षेत्र है। अल्फ्रेड थेयर महान ने 21वीं सदी में हिंद महासागर के महत्व को स्पष्ट करते हुए कहाजिसका भी हिंद महासागर पर नियंत्रण होगा वह एशिया पर हावी होगा। 21वीं सदी में दुनिया का भाग्य इसके जल पर तय होगा।

 

यद्यपि हिंद महासागर के तटवर्ती राज्य एक लम्बे समुद्री यात्रा के इतिहास का दावा करते हैं, किंतु भारत सहित कोई भी क्षेत्रीय शक्ति पूरे हिंद महासागर क्षेत्र पर हावी होने में कभी सक्षम नहीं रहा है। जैसा कि इतिहास से परिलक्षित होता है, हिंद महासागर में बहुत लंबे समय तक बाहरी शक्तियों का दबदबा रहा है। 15 वी शताब्दी के अंत में वास्कोडिगामा द्वारा नए मार्गों के खोज के बाद यह क्षेत्र विदेशी शक्तियों के आकर्षण का केंद्र रहा है। यह क्षेत्र पुर्तगाल, डच, हालैंड, फ्रांस तथा ब्रिटेन का उपनिवेश था। द्वितीय महायुद्ध से पूर्व तक हिंद महासागर के तटवर्ती क्षेत्रों पर ब्रिटेन का नियंत्रण था। तथा हिंद महासागर कोब्रिटेन की झीलके नाम से पुकारा जाता था। द्वितीय विश्व युद्ध के अंत के साथ ही हिंद महासागर के तटवर्ती क्षेत्रों से ब्रिटेन का प्रभुत्व समाप्त होने लगा। 1966 में ब्रिटेन ने स्वेज से पूर्व में स्थित अपने नौसैनिक अड्डे को धीरे-धीरे समाप्त करने की घोषणा कर दी। जिससे इस क्षेत्र में शक्ति शून्यता (च्वूमत टवबबनउ) उत्पन्न हो गया। और यह क्षेत्र शीत युद्ध की महाशक्तियों के राजनीति का प्रधान अखाड़ा बन गया। और 1970 के दशक में अमेरिका का हिंद महासागर के मुख्य प्रवेश द्वार पर नियंत्रण हो गया और उसने केपमार्ग, डियागोगार्शिया, कोकबर्न, मलक्का जलडमरूमध्य पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। सोवियत संघ के विघटन के बाद हिन्द महासागर में अमेरिका का प्रभुत्व बढ़ा, किन्तु तेजी से उभरती हुई एशिया की दो शक्तियां भारत और चीन हिन्दमहासागर में अपने प्रभुत्व विस्तार की लालसा के कारण अमेरिका के लिए कड़ी चुनौती बन गयी। इस प्रकार 21वीं शदी में हिन्दमहासागर में तीन मुख्य दावेदार भारत, चीन और अमेरिका हो गए। जिनके बींच शक्ति संतुलन को लेकर शक्तिसंघर्ष है।

 

हिन्द महासागर में भारतीय हित - भारत को हिन्दमहासागर में किसी भी अन्य देश की तुलना में अद्वितीय भौगोलिक श्रेष्ठता प्राप्त हैद्य भारतीय प्रायद्वीप हिन्दमहासागर में 1000 मील तक है। यह बंगाल की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला एक मात्र व्यवहार्य संपर्क है। इसप्रकार दुनिया में बहुत कम देश हैं जो भौगोलिक रूप से एक महासागरीय क्षेत्र पर इतनी बढ़त में है, जिस प्रकार भारत हिन्दमहासागर पर है। हालाँकि आजादी के बाद भारत की सरकारों ने उत्तर से आने वाले खतरों (चीन और पाकिस्तान) का मुकाबला करने में अपनी लगभग सारी उर्जा लगा दी। किन्तु 90के दशक के बाद मुख्यतः 21वीं शदी में भारत की आर्थिक शक्ति में वृद्धि हुई और अब भारतीय सरकारों ने सामुद्रिक शक्ति को मजबूत करने में ध्यान दिया। वर्तमान समय में भारतीय नौसेना दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी सामुद्रिक शक्ति है और महत्वकांक्षी विस्तार योजनाओं को आगे बढ़ा रही है। नौसेना स्टाफ के प्रमुख एडमिरल निर्मल कुमार वर्मा ने कहा कि वर्ष 2025 तक भारतीय नौसेना 162 आयातित और स्थानीय रूप से डिजाइन किये गए प्लेटफार्मो का सचालन करेगी, जिसमे दो विमान वाहक पारंपरिक और परमाणु उर्जा पनडुब्बियां शामिल हैं। अपनी बढ़ती सामुद्रिक शक्ति और भौगोलिक लाभों के आधार पर भारत निश्चित रूप हिन्दमहासागरीय मामलों में बड़ी भूमिका निभाएगा। इस प्रकार भारत के पास आईओआर (प्व्त्) में एक प्रमुख समुद्री शक्ति होने की क्षमता है।

 

नियति ने भारत को अद्वितीय भौगोलिक स्थिति प्रदान की है। जो भारत को हिन्दमहासागर पर हावी होने या यहाँ तक की इसे भारत के महासागर में बदलने की आकांक्षा प्रदान करती है। कई भारतीय रणनीतिकार हिन्दमहासागर को अपनेउचित डोमेनके रूप में देखतें हैं। और सोंचते हैं कि यदि शांति और सहयोग की भावना बढ़ानी है तो भारत को हिन्दमहासागर में बहुत बड़ी भूमिका निभानी होगी। भारतीय नौसेना अपनी क्षमता, रणनीतिक स्थिति और हिन्दमहासागर क्षेत्र में मजबूत उपस्थिती के आधार पर आईओआर में शांति और स्थिरता बनायें रखने में सहायक हो सकती है। हमारे पड़ोस के छोटे देशों के साथ-साथ ऐसे देश जो अपने ब्यापार और उर्जा आपूर्ति के लिए हिन्दमहासागर के पानी पर निर्भर है ,उम्मीद करने लगे हैं की भारतीय सेना हमारे तटों के आस पास के पानी में स्थिरता और शांति सुनिश्चित करेगी। प्रसिद्ध भारतीय रणनीतिकार के.एम. पणिक्कर के अनुशार भारत का प्रायद्वीपीय चरित्र और समुद्री यातायात पर इसके ब्यापार की अनिवार्य निर्भरता, इसके भाग्य को समुद्र पर निर्भर करती है। भारत का आर्थिक जीवन पूरी तरह से उस शक्ति की दया पर निर्भर होगा, जो समुद्रों को नियंत्रित करती है। यह कहा जा सकता है कि सोलहवीं शताब्दी के प्रथम दशक में जब तक भारत ने समुद्र की कमान नहीं खोई थी तब तक भारत ने अपनी स्वतंत्रता नहीं खोई।

 

हिन्द महासागर की स्थिरता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत अपने समुद्री उत्थान को कैसे प्रबंधित करता है। एक ओर, यदि एक मजबूत भारतीय समुद्री उपस्थिति को अमल में लेने में विफल रहे, तो नयी दिल्ली अनिवार्य रूप से क्षेत्रीय जल में अपने हितों को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर हो जाएगी, जिससे अमेरिका और चीन के लिए एक रणनीतिक शून्य हो जायेगा। दूसरी ओर यदि शक्तिशाली भारतीय नौसैनिक बलों का उपयोग बहिष्करण उद्देश्य के लिए किया जाता है। तो यह क्षेत्र लगभग निश्चित रूप से नौसैनिक प्रतियोगिता का अखाड़ा बन जायेगा।

 

चीन का बढ़ता प्रभाव - 21वीं शदी में सैन्य रणनीतिकारों, विद्वानों और पत्रकारों ने हिन्दमहासागर क्षेत्र मेंसमुद्री महान खेलके बारे में बातें करना शुरू किया, खासकर तब, जब चीन द्वारा अपनी नौ सैन्य क्षमताओं को बढ़ाने का फैसला किया गया। भारत के सापेक्ष चीन का रक्षा बजट तीन गुना अधिक है और यह सम्पूर्ण विश्व में द्वितीय स्थान पर है। चीन हिन्दमहासागर में अपना वर्चस्व स्थापित कर अपनी ब्यापारिक, आर्थिक, और रणनीतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना चाहता है। चीन, दक्षिण चीन सागर से लेकर हिन्दमहासागर से होते हुए पूर्वी अफ्रीका तक के विशाल इलाके में नौ सैन्य अड्डे स्थापित कर रहा है। यहाँ से भारत की सीमा काफी नजदीक है, जो भारतीय सुरक्षा को चुनौती उत्पन्न करते हैं। और इस प्रकार चीन हिन्द महासागर में भारत की भौगोलिक बढ़त को सीमित करना चाहता है। चीन द्वारा हिन्द महासागर क्षेत्र में भारत को घेरने की इस नीति को अमेरिकी रणनीतिकार ब्रूज एलेन हेमिल्टन ने अपनी एक रिपोर्ट में मोतियों की माला (ैजतपदह िच्मंतसे)का नाम दिया। वर्ष 2005 में पेंटागन ने अपनी रिपोर्ट में चीन की हिन्दमहासागर में भारत को घेरने की नीति को विस्तृत रूप से वर्णन किया। दक्षिण पूर्व एशिया क्षेत्र में चीन का सबसे करीबी देश म्यांमार है। चीन ने म्यांमार के कोको द्वीप पर हवाई पट्टी राडार स्टेशन तथा नौसैनिक बेस स्थापित किया है। यह द्वीप अंडमान निकोबार द्वीप से मात्र 45 किमी की दूरी पर तथा अंतर्राष्ट्रीय जलमार्ग मलक्का के नजदीक होने के कारण इसका स्त्रताजिक महत्त्व है। इसके अलावा चीन म्यांमार के सितवे बंदरगाह का भी विकास कर रहा है जो कोलकाता से अधिक दूरी पर नहीं है। इसी क्रम में चीन ने बांग्लादेश के चट्टगांव बंदरगाह पर कंटेनर पोर्ट तैयार करने के साथ-साथ इसका आधुनिकीकरण किया, जिसकी दूरी भारत से अधिक नहीं है।

 

भारत के दक्षिण में स्थित श्रीलंका के हम्बनटोटा बंदरगाह को भी चीन द्वारा विकसित किया गया। इस बंदरगाह पर चीन की सैन्य पनडुब्बियों को देखा गया है, जो केवल ब्यापारिक दृष्टिकोण के प्रयोग पर संदेह उत्पन्न करता है इसी क्रम में चीन पाकिस्तान में ग्वादर बंदरगाह का विकास कर रहा है। यह बंदरगाह सामरिक एवं आर्थिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह बंदरगाह भारत से मात्र 460 किमी की दूरी पर है, तथा ईरान से सटा है। हर्मुज जलसन्धि से निकलने वाली सभी ब्यापारिक जहाजों पर यहाँ से निगरानी रखी जा सकती है। इस बंदरगाह में नाभिकीय पनडुब्बी एवं प्रक्षेपास्त्रों से लैस नवीनतम जलयानो की तैनाती चीन द्वारा की जा रही है।

 

इसी तरह चीन ने मालदीव में भी बंदरगाह का आधुनिकीकरण किया है। चीन हिन्दमहासागर में भारत के पड़ोस में उसे घेरने के साथ-साथ पश्चिम एशिया पूर्वी अफ्रीका में भी अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। कुछ दिनों पहले चीन ने एक छोटे से द्वीप सेशेल्स में भी नौ सैनिक अड्डा बना लिया है। जो चीन के मुख्य भूमि से सूडान के पोर्ट तक का क्षेत्र है।

 

वन बेल्ट वन रोड- सर्वप्रथम वन बेल्ट वन रोड परियोजना की रूपरेखा चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने नजरबायेव विश्वविद्यालय अस्थाना (कजाकिस्तान) में 7 सितम्बर 2013 में रखी। वन बेल्ट वन रोड में दो रूट होंगे, पहला लैण्ड रूट, जिसे शिल्क रोड आर्थिक बेल्ट भी कहा गया। दूसरा समुद्री रूट जिसे समुद्री सिल्क रोड कहा गया। यदि सिल्क रोड आर्थिक बेल्ट की बात करें तो यह प्राचीन सिल्क रोड है जो चीन से पूर्वी यूरोपे तक जमीनी माध्यम से जाता है। प्राचीन काल में इसी रास्ते से मसाले सिल्क का निर्यात होता था। यदि समुद्री सिल्क रोड की बात करें तो यह चीन के फ्युजी प्रान्त के क्वंझाऊ से शुरू होता हैं, फिर मलक्का जलडमरूमध्य, क्वालालम्पुर से होते हुए भारत के शहर कोलकाता पहुँचता है, फिर इसे पार करने के बाद हिन्दमहासागर से गुजर कर केन्या की राजधानी नैरोबी पहुँचता है। फिर हॉर्न ऑफ अफ्रीका के बाद लाल सागर से होते हुए मेडिटेरिनियन तक पहुँचता है। जहाँ से एथेंस पहुँचता है और आखिर में वेनिस पहुँच कर सिल्क रोड आर्थिक बेल्ट से मिल जाता है।

 

वन बेल्ट वन रोड का मुख्य हिस्सा चीन पाकिस्तान आर्थिक कारीडोर (ब्च्म्ज्ञ) भारत की चिंता का प्रमुख कारण है इसके तहत चीन, पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट को चीन से रोड और रेल नेटवर्क से जोड़ रहा है। जिससे चीन को अरब सागर में सामान पहुँचाने में सहायता मिल सके। चीन सिपेक के जरिये उत्तर भारत के चारो तरफ फैल गया। राजस्थान से सटे पाकिस्तानी बार्डर पर बड़ी मात्रा में चीन ने सैनिक तैनात कर दिया है, जिससे भारत पर नजर रखी जा सके। सीपेक का सबसे बड़ा विरोध कर्ता भारत है, इसका मुख्य कारण यह है कि इसके तहत बनने वाली काराकोरम हाइवे पाक अधिकृत जम्मू कश्मीर अक्साई चीन से हो कर गुजरेगी जो की वैधानिक रूप से भारतीय हिस्सा है। यह भारतीय संप्रभुता और अखंडता के लिए चुनौती है।

 

इस प्रकार देखा जा सकता है की चीन मोतियों की माला नीति तथा वन बेल्ट वन रोड नीति के द्वारा हिन्दमहासागर के तटीय देशों को आर्थिक सैनिक सहायता देकर हिन्दमहासागर में अपना प्रभुत्व स्थापित कर रहा है। इन्ही कारणों से भारत और अमेरिका दोनों के लिए चीन मुख्य चुनौती बना हुआ है।

 

हिन्द महासागर में अमेरिका - द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अनेक विरोधों और आर्थिक एवं सामरिक रूप से ब्रिटेन के कमजोर होने तथा पाउंड के उन्मूलन के कुछ हफ्ते पश्चात, जनवरी 1968 में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि वर्ष 1971 के शुरुआत से अंग्रेजी सैनिकों को स्वेज के पूर्व के सभी ठिकानों से वापस ले लिया जायेगा। यद्यपि कि 1964 तक हिन्द महासागर निश्चित रूप से अमेरिका की रणनीतिक गणनाओं में शामिल हो गया था। किन्तु 1968 में स्वेज के पूर्व से अंग्रेजों की औपचारिक घोषणा के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका ने हिन्द महासागर में एक प्रभावशाली प्रवेश किया। इस समय अमेरिका का सातवा बेड़ा हिन्द महासागर में मौजूद था। धीरे दृ धीरे हिन्द महासागर के सभी मुख्य चोक बिंदु पर तथा हिन्द महासागर के पूर्वी अफरीकी देशों तथा पश्चिम एशियाई देशों से लेकर दक्षिण पूर्व एशियाई देशों तक सभी के साथ अमेरिका के संबध शीत युद्ध की समाप्ति तक काफी अच्छे थे। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद सम्पूर्ण हिन्द महासागर पर अमेरिका का नियंत्रण था। किन्तु 21 वीं शदी में भारत और चीन जैसी शक्तियां भी हिन्द महासागर में महत्वपूर्ण भूमिका के लिए तैयार हो गयीं। 21 वीं शदी के लगभग दो दशक बीतने के बाद सम्पूर्ण हिन्द प्रशांत क्षेत्र में चीन की महवपूर्ण होती भूमिका को देखा जा सकता है। चीन इस क्षेत्र में ब्यापारिक गतिविधियों के साथ-साथ सामरिक गतिविधियों के लिए भी केवल तैयार ही नहीं बल्कि आक्रामक है। इसलिए वर्तमान सैन्य रणनीतिकारों ने हिंद महासागर में भविष्य की चीनी नौसैनिक महत्वाकांक्षाओं और ऐसी नई उपस्थिति के लिए संभावित अमेरिकी प्रतिक्रियाओं पर ध्यान केंद्रित किया है। कुछ हद तक, अमेरिका-भारत संबंधों में सुधार और हिंद महासागर मामलों में उनके सहयोग के लिए चीनी कारक एक अनिवार्य तत्व है। क्योंकि अमेरिका और भारत दोनों आईओआर में चीनी प्रवेश के बारे में गंभीर रूप से चिंतित हैं।

 

निष्कर्ष

वर्तमान समय में हिंद महासागर क्षेत्र में भारत, अमेरिका और चीन तीन सबसे महत्वपूर्ण हितधारक है। आईओआर तीनों देशों की सुरक्षा और हितों के लिए महत्वपूर्ण है। उनकी बातचीत और क्रिया का हिंद महासागर क्षेत्र के शांति स्थिरता और समृद्धि पर प्रभाव पड़ेगा। इसीलिए तीनों देशों की जिम्मेवारी है कि हिन्दमहासागर क्षेत्र के सहयोग और सहस्तित्व की दिशा में प्रयास करें।

 

चीन के सामुद्रिक शक्ति के रूप में उदय के साथ आम तौर पर यह धारणा प्रचलित है कि हिंद महासागर क्षेत्र में या अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहता है। तथा भारत की भौगोलिक बढ़त को कम करते हुए उसे उसके घर में ही स्ट्रिंग आफ पर्ल्स के माध्यम से घेर रहा है। तथा अपने व्यापार वर्चस्व को स्थापित करने के लिए वन बेल्ट वन रोड जैसी योजनाओं के माध्यम से हिंद महासागर के मुख्य चोक पॉइंट पर अपने स्ट्रेटजिक नौ सैनिक अड्डे स्थापित कर हिन्द महासागर के मुख्य व्यापारिक मार्गों पर अपनी बढ़त स्थापित कर रहा है। जो कि भारत के साथ-साथ वैश्विक शक्ति अमेरिका के लिए मुख्य चुनौती बन गया है। जिसका कि 90 के दशक के बाद हिन्दमहासागर क्षेत्र पर पूर्ण प्रभुत्व था। अन्य कारकों के अलावा यह भी एक प्रमुख कारक है जो भारत और अमेरिका को हिन्दमहासागर क्षेत्र में साथ लाने के लिए प्रेरित किया है। भारत और अमेरिका मालाबार सैन्य अभ्यास नौसैन्य साजो सामान का आयात निर्यात क्वाड जैसे संगठनो के माध्यम से चीन को प्रसंतुलित करने हिन्दमहासागर क्षेत्र में मुक्त आवागमन, नियम आधारित ब्यवस्था बनाये रखने के प्रयास में दृ ढसंकल्प है।

 

किंतु हिंद महासागर में स्थिरता और शांति तभी स्थापित हो सकती है जब भारत, अमेरिका और चीन तीनों साथ आकर परस्पर सहयोग करें। सुरक्षा खतरों का मुकाबला करने के लिए तीनों देशों के सहयोग के लिए पर्याप्त जगह है। तीनों देशों को अपने अपने सामान्य हितों को प्राप्त करने तथा क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को बनाए रखने के लिए अन्योन्याश्रित और सहकारी क्रियान्यवन कर करना चाहिए।

 

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Received on 27.06.2023        Modified on 19.08.2023

Accepted on 07.09.2023        © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences. 2023; 11(3):157-162.

DOI: 10.52711/2454-2679.2023.00024