औषधीय पौधों की कृषि विपणन का समीक्षात्मक मूल्यांकन

(जबलपुर जिले के विशेष सन्दर्भ में)

 

डॉ. सुषमा चौधरी

अतिथि विद्वान (अर्थशास्त्र), शासकीय महाविद्यालय, नागौद, सतना (.प्र.)

*Corresponding Author E-mail:

 

ABSTRACT:

भारत में औषधीय पौधों की कृषि विपणन सर्वाधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की श्रम शक्ति का 64 प्रतिशत भाग कृषि क्षेत्र से आजीविका प्राप्त करता है तथा सकल घरेलू उत्पादन में कृषि का क्षेत्र का हिस्सा 20 प्रतिशत के लगभग है। आज बाज़ार तथा बाज़ार सम्बन्धी क्रिया दोनों ही आर्थिक कोई भी देश जहॉ की अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान हो तथा कृषि ही उस देश की जनसंख्या के अधिकांश भाग के भरण-पोषण का एक मात्र आधार हो उस देश की सरकार का यह उत्तरदायित्व होता है कि इसकी उन्नति पर विशेष ध्यान दे। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् अपनी सरकार ने कृषि विकास के महत्व को स्वीकारते हुए योजनाओं मे इसको मुख्य स्थान दिया। फलस्वरूप हरित क्रान्ति का सृजन और चलन हुआ, आधुनिक तकनीकी युक्त कृषियन्त्रों, कृषि उपकरणों, उन्नत बीजो का प्रचलन तथा रासायनिक उर्वरको के उपयोग में वृद्धि ने उत्पादन तथा उत्पादकता के स्तर को समुनन्त किया। कृषि के उन्नत के साथ कृषि विपणन व्यवस्था का उन्नत होना आवश्यक है, क्योंकि यह अनुभव किया जाने लगा है कि कृषि उत्पादों के विपणन का उतना ही महत्व है जितना स्वतः उत्पादन का वस्तुतः विपणन की क्रिया का अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका होती है, क्योंकि इसके द्वारा उपभोग और उत्पादन में सन्तुलन ही नही वरन् अधिक विकास का स्वरूप भी निर्धारित होता है।

 

KEYWORDS: औषधीय फसल, कृषि विपणन, भारतीय अर्थव्यवस्था।

 


 


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मध्यप्रदेश के सन्दर्भ में जहाँ की अर्थव्यवस्था ही कृषि प्रधान है ओर आबादी का एक बड़ा भाग 70 प्रतिशत गाँवों में रहकर कृषि तथा कृषि सम्बन्धी अन्य उद्योगों से अपना जीवन यापन कर रहा है, औषधीय पौधों की कृषि अनेक सम्भावनाओं को जन्म देती हैं प्रदेश की मिट्टी ओर जलवायुवीय दशाएँ बहुत सी औषधीय प्रजातियों के फलने-फूलने के लिये आदर्श कही जा सकती हें पिछले एक दशक में प्रदेश के औषधीय निर्माताओं ने केवल विदेशी बाज़ारों में दस्तक दी है बल्कि यहाँ के कृषकों ने भी सैकड़ों एकड़ क्षेत्र में औषधीय पौधों की फसल लेकर उत्कृष्ट उत्पादन प्राप्त कर अपना उत्साह दर्शाया हें प्रदेश में प्रति वर्ष औषधीय फसलों की कृषि का रकबा बढ़ता जा रहा है। सामान्य तौर पर विपणन शब्द का तात्पर्य उन सभी विपणन कार्यों एवं सेवाओं के करने से है, जिनके द्वारा वस्तुएँ उत्पादक से अंतिम उपभेक्ता तक पहुंचती है, इसके अंतर्गत विपणन की सभी सहयोगी प्रक्रियाएँ एकत्रीकरण, पैकेजिंग, परिवहन, संग्रहण, श्रेणी चयन एवं मानकीकरण, वित्त जोखिम प्रबंध, विज्ञापन, आदि सम्मिलित होती है, उत्पादन को उपभोग से जोड़ने वाली श्रृंखला की समस्त कड़ियाँ विपणन में सम्मिलित होती हैं।

 

प्रो. थामसन के अनुसार

कृषि विपणन के अध्ययन में वे सभी कार्य एवं कच्चामाल एवं संस्थाएं सम्मिलित होती हैं जिनके द्वारा कृषकों के फार्म पर उत्पादित खाद्यान्न, कच्चा माल एवं उनसे निर्मित माल का फार्म से उपभोक्ताओं तक संचालन होता है।

 

प्रो. अबोट के अनुसार

कृषि विपणन से तात्पर्य उन सभी कार्यों से होता है, जिनके द्वारा खाद्य वस्तुएँ एवं कच्चा माल फार्म से उपभोक्ता तक पहुंचता है।   

 

जबलपुर जिले में भी कृषि विकास सम्बन्धी इन योजनाओं के क्रियान्वयन के साथ यहॉ की जर्जर अर्थव्यवस्था को सुधारने का प्रयास तो किया गया, और यहॉ कि वसुन्धरा को सुजलाम् सुफलाम् की सार्थक परिधि के लाने के लिए सिंचाई की अनेक योजनाओं के साथ तलाबों जैसी सिंचाई परियोजना का क्रियान्वयन हुआ। फलतः के क्षेत्र में भू-भाग भी समुन्नति की ओर अग्रसित हुआ।

 

कृषि के उन्नत के साथ कृषि विपणन व्यवस्था का उन्नत होना आवश्यक है, क्योंकि यह अनुभव किया जाने लगा है कि कृषि उत्पादों के विपणन का उतना ही महत्व है जितना स्वतः उत्पादन का वस्तुतः विपणन की क्रिया का अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका होती है, क्योंकि इसके द्वारा उपभोग और उत्पादन में सन्तुलन ही नही वरन् अधिक विकास का स्वरूप भी निर्धारित होता है।

 

कृषि विपणन की दशा का समीक्षात्मक मूल्यांकन (जबलपुर जिले के विशेष संदर्भ में) विषय पर अभी तक शोध कार्य नहीं किया गया है। इस विषय कि सम्बन्धित बघेलखण्ड में कृषि विपणन पर डॉ0 .जकारिया के निर्देशन में डी.एस. तिवारी द्वारा शोध कार्य ‘‘बघेलखण्ड कृषि विपणन’’ पर किया गया है, तथा डॉ0 श्रीमती दीपा जबलपुरस्तव के निर्देशन में आर.पी. तिवारी द्वारा ‘‘उदारीकरण के पश्चात् कृषि विपणन की दशा का आलोचनात्मक मूल्यांकन ’’(जबलपुर जिले के विशेष संदर्भ में) विषय पर भी किया गया है।

 

चूॅकि यह शोध कार्य मेरे शोध क्षेत्र सीमा के बाहर का तथा एक दशक पुराना हो चुका है, आज विपणन की समस्याएॅ आवश्यकताएॅ जहॉ की तहॉ बनी हुई है। अतः इस विषय पर नए सिरे से शोध कार्य की आवश्यकता को देखते हुए मैने जबलपुर जिले में कृषि विपणन की दशा का चुनाव किया है, जिसमें कृषि क्षेत्र कृषि विपणन के विकास में बाधाएॅ उदासीनता पर नवीन शोध एंव सुझाव दिया जा सकेगा।

 

बघेलखण्ड में कृषि विपणन साहित्य पर सन् 1988 में तथा उदारीकरण के पश्चात् कृषि विपणन की दशा का आलोचनात्मक मूल्यांकन (जबलपुर जिले के विशेष संदर्भ में) विषय पर 2010 में शोध कार्य किया गया है। पूर्व में इस विषय से सम्बन्धित कृषि विकास, कृषि विपणन, कृषि के प्रकार, कृषि से प्राप्त होने वाली आय, सिंचाई, कृषि औजार यंत्र आदि तथ्यों पर प्रकाश डाला गया है। शोध कार्य करते हुए कृषि विपणन का स्वरूप परिवर्तन कृषि व्यापार एवं व्यवसाय से आय बढ़ाने के लिए सुझाव दिया गया है। कृषि विपणन के अन्तर्गत भण्डारण, विनिमय, क्रय-विक्रय के साथ-साथ उपभोग उत्पादन क्रियाओं को प्राथमिकता प्रदान की गई है। कृषि के सम्बन्धित अनेक क्रियाएॅ संचालित होती है। शोधग्रंथ में कृषि उत्पादक तथा अन्तिम उपभोक्ता दोनों कड़ियो को जोड़ने का प्रयास किया गया है। परन्तु समीक्षा के बारे में कोई स्थान नहीं दिया गया है।

 

औषधीय पौधों की कृषि विपणन पद्धतियॉ तथा इसमें परिवर्तन प्रदेश के अन्य जिले में जबलपुर जिले के कृषि विपणन का तुलनात्मक अध्ययन पर शोध कार्य कर कृषि भण्डारण, कृषि विपणन, कृषि परिवहन, कृषि नीति आदि सुविधायें प्रदान किये जाने के साथ ही कृषि विपणन व्यवस्था को विकसित किया जाएगा, इससे सम्बन्धित सुझावों को कृषि विपणन के पिछड़ेपन को दूर करना, उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि, कृषि विपणन तकनीक में सुधार कृषि उपज में वृद्धि एवं संग्रहण किये जाने का प्रयास करने के साथ-साथ कृषि विपणन के परम्परागत पद्धतियों के स्थान पर कृषि विपणन पद्धतियों में वर्तमान तकनीक उपलब्ध कराए जाने हेतु महत्वपूर्ण सुझाव दिए जायेंगे, कृषि विपणन में परिवहन एवं यातायात का महत्वपूर्ण स्थान होता है।

 

जबलपुर जिले को प्रदेश एवं देश के कृषि विपणन बाजार से जोड़ने हेतु आवश्यक सुझाव के साथ-साथ कृषि मूल्यों से सम्बन्धित महत्वपूर्ण नीति निर्धारित की जायेगी। कृषि विपणन भी उपर्युक्त महत्वपूर्ण तथ्यों के साथ-साथ कृषि उत्पादन का परिसंस्करण, कृषि परिसंस्करण हेतु प्रमुख नीतियो यथाकृषिउत्पाद को सुखाना, विपणन के लिए उपलब्ध कराना एवं वित्तीय सुविधाएॅ उपलब्ध कराए जाने का प्रयास किया जाएगा। शोध क्षेत्र के कृषि विपणन की अपार सम्भावनाएॅ होते हुए भी यहॉ की कृषि विपणन भी व्यवस्था ठीक नहीं है।

 

पूर्व शोध की समीक्षा

कॉनराय एट आल (2001) भारत में ग्रामीण कृषक परिवारों के पास आय के साधन के पशु उपलब्ध है। राष्ट्रीय स्तर पर पशुधन की आबादी बढ़ी है हालांकि एक क्षेत्रीय पैमाने और अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में विशेष रूप से स्थिति बहुत अलग और अधिक जटिल है, उदाहरण के लिए ग्रामीण क्षेत्र के भीतर पशुधन बढ़ी जाती है तथा शहरी क्षेत्रों में पशुधन की आबादी कम होती है। जिससे ग्राीमण किसानों की स्थिति सुधर रही है।

 

ब्रिजेन्द्र पाल सिंह (2000) भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि है। इसके विकास से अर्थव्यवस्था में दृढ़ता आती है। राष्ट्रीय आय में इसका योगदान 34 प्रतिशत के आसपास है। गत वर्षो में खाद्यान तथा व्यावसायिक फसलों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। कृषि उत्पादन को प्रभावित करने वाले तत्वों में प्राकृतिक और आर्थिक दोनो महत्वपूर्ण है। विगत दो-तीन दशकों में भारत में द्वितीयक क्षेत्र एवं तृतीयक क्षेत्र को तीव्र गति से विस्तार हुआ है प्रभावी देश की कार्यशील जनसंख्या का 52 प्रतिशत प्राथमिक क्षेत्र पर आश्रित है। देश में कृषि 115.5 मिलियन कृषक परिवारों की आजीविका का माध्यम है। यहाँ तक कि सकल राष्ट्रीय उत्पाद का लगभग 15 प्रतिशत भाग कृषि उसकी सहायक क्रियाओं से प्राप्त होता है। भारत में अनेक महत्वपूर्ण उद्योग प्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर देश की 1.21 अरब से अधिक जनसंख्या के खाद्यान खाद्य पदार्थो की आपूर्ति कृषि क्षेत्र से ही की जाती है। करोड़ों पशुओं को प्रतिदिन चारा कृषि क्षेत्र से ही प्राप्त होता है।

 

डॉ. आर. के. भारतीय (2006) भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकतर लघु तथा सीमांत कृषकों खेतिहर मजदूरों तथा अन्य श्रमिकों, शिल्पियों, व्यवसायिक एवं सेवा करने वाले परिवारों का ही बाहुल्य है। परन्तु आज भी इनमें से अधिकांश परिवार गरीबी रेखा के नीचे जीवन व्यतीत कर रहे हैं! अतः यह कहा जा सकता है कि भारत का समाजिक एवं आर्थिक विकास ग्रामीण क्षेत्रों के बुनियादी विकास पर ही आधारित है। ग्रामीण विकास की अनेकोनेक समस्याएं जिनमें प्रमुख रूप से आर्थिक अधोसंरचना, कृषि, लघु एवं कुटीर उद्योग समान्वित विकास की समस्याएं है!

 

शोध प्रविधि

जबलपुर जिले में स्थित मण्डियों में से निदर्शन विधि का अनुप्रयोग करते हुए जिले से सभी मण्डियों का अध्ययन कर कुछ चिन्हित मण्डियों को प्रतिक अध्ययन के लिए चुना जाएगा। मण्डियों के चयन में उनकी स्थिति कार्यक्षेत्र आदि का ध्यान रखते हुए जिले में सभी तहसीलों में से एक-एक विनियमित मण्डी तथा जिले में एक प्राथमिक स्तर में गांव में स्थित विनियमित मण्डी का चयन कर अध्ययन किया जावेगा।

मण्डी सम्बन्धी तथ्यों की जानकारी प्राप्त करने हेतु प्रश्नावली बनाकर मण्डी समिति के पदाधिकारियों एवं मण्डी सचिवो से सम्पर्क अभियान द्वारा विषय से सम्बन्धित जानकारी एकत्रित कर उपक्रम बनाया जाएगा। कृषि सम्बन्धी उत्तर प्राप्त करने के लिए स्तरवार निदर्शन विधि का प्रयोग किया जावेगा। अन्त में सांख्यिकी विश्लेषण के बाद शोधकर्ता द्वारा प्रतिवेदन प्रस्तुत कर जाएगा इस सम्बन्ध में एकत्रित किए गये प्राथमिक द्वितीयक एंव गौर आंकड़े हेतु किया गया है।

 

औषधीय पौधों की कृषि विपणन तकनीकी में सुधार, कृषि उत्पादन में वृद्धि, मध्यस्थों की समाप्ति, कृषि विनिमय हेतु वित्तीय सुविधाएॅ, कृषि उत्पाद मूल्य में वृद्धि तथा कृषि विपणन का व्यावसायिक कार्य, व्यवसायिक अनुभव, पूॅजी निवेश, छोटे कृषि व्यापारियों को संरक्षण कृषि के लिए वित्तीय सुविधाएॅ, व्यावसायिक प्रशिक्षण, यातायात का विकास, भण्डारण प्रक्रिया में सुधार, व्यावसायिक स्थिति का मूल्यांकन, मूल्य में स्थिरता जैसे अनुकूल प्रभाव पड़ेगा। कृषि विपणन में जमाखोरी की समाप्ति, कृषि क्षेत्र को औद्योगिक क्षेत्र मानने के साथ-साथ गांवो में कृषि उत्पाद के विक्रय हेतु आवश्यक सुविधाएॅ प्रदान करने का प्रयास होगा। कृषि विपणन क्षेत्र में सहाकरी समितियों के विकास हेतु कृषि विपणन क्षेत्र में सहकारी समितियों के विकास हेतु सरकारी एजेन्सी द्वारा कम मात्रा का पूर्व निर्धारण उत्पादक व्यापारियों से कृषि आय में वृद्धि जैसे उपायों को अपनाने से कृषि विपणन तथा कृषि उपज में उत्तरोत्तर वृद्धि होगी। कृषि उपकरणों वित्तीय सुविधाओं में वृद्धि के साथ ही अन्य आवश्यक मूलभूत सुविधाओं में विकास हेतु उपाय किये जायेगे। सहकारी विपणन व्यवस्था को प्रोत्साहन दिया जाएगा उत्पादको को उचित मूल्य दिलाए जाने के साथ ही पूंजीवादी बाजार को रोकने का प्रयास किए जाएगा, साथ ही कृषि विपणन व्यवसाय का विस्तार किया जाएगा, विस्तार के साथ ही देश वे अन्य विकसित राज्यों की कृषि विपणन के समान किया गया है।

 

शोध के उद्देश्य:-

·                कृषकों एवं सहकारी बैंकों की अर्थिक दशाओं का अध्ययन कर उनका जीवन स्तर ऊपर उठाने हेतु आवश्यक सुझाव प्रस्तुत करना।

·                सहकारी बैंकों के योगदान द्वारा ग्रामीण कृषि प्रक्षेत्र की समस्याओं को दूर करने का समन्वित प्रयास भी है? इसके अन्तर्गत न केवल लघु कृषकों की पहचान की जा सकेगी वरन् उन्नयन हेतु आवश्यक साधन/सुझाव उपलब्ध कराना।

·                जिले में संचालित सहकारी बैंकों के विभिन्न योजनाओं से लाभान्वित कृषकों के आर्थिक विकास की दर प्राप्त कर उसकी समीक्षा करना।

·                संस्थागत बैंकों की कार्यप्रणाली एवं ब्यूह रचना का अध्ययन।

·                केन्द्रीय सहकारिता बैंक के द्वारा दी जाने वाली सहायता एवं सहयोग के फलस्वरूप हितग्राहियों के रोजगार प्रभाव का अध्ययन करना।

·                संस्थागत बैंकों द्वारा चलाये जा रहे विभिन्न कार्यक्रमों का अध्ययन करना।

·                कृषकों की आर्थिक दशा के सफलता हेतु समुचित साधनों एवं उपायो को सुझाना जिससे भविष्य में इन योजनाओं को और प्रभावशाली बनाया जा सके।

 

शोध सीमाएँ -

’’सितीर्षुः दुस्तरम मोहा दुहुपेनाडस्मि सागरम्’’ ज्ञान की छोटी पनसुइया नौका से शोध के महान् सागर को पार करने की इच्छा स्वरूप मेरे प्रयास से यह शोधसामग्री निश्चय ही अध्ययन की विविध सीमाओ में संकलित है। आर्थिक विकास एक ऐसी विषयवस्तु है जिसके प्रत्येक अंश पर शोध ग्रन्थ की रचना की जा सकती है, ग्रामीण क्षेत्रों के आर्थिक विकास का स्पर्श कर आरंभिक अध्ययनकर्ता विविध रूपों में वर्णन करते है। फलतः आर्थिक विकास के किसी एक क्षेत्र को लेकर विभिन्न स्वरूप को लेकर अध्ययन किया गया। व्यक्तिशः अध्ययनकर्ता होने के कारण अर्थ तथा समयावधि की अरूपतावश आर्थिक विकास  के विभिन्न क्षेत्रों का विशद विश्लेषण सम्भव नहीं हो सका है फिर भी विषय वस्तु को पर्याप्त रूप - में स्पष्ट किया गया है।

अध्ययन के सीमा की कड़ी में आर्थिक विकास के अन्तर्गत आने वाली सभी उत्पाद वस्तुओं के उत्पादन की स्थिति पर समान ध्यान नही दिया गया है।

 

प्रस्तुत शोध की सीमाए जबलपुर राजस्व क्षेत्र अंर्तगत आने वाले विभिन्न क्षेत्रों में केन्द्रित है। अध्ययन का क्षेत्र मूलतः 2005 के बाद की जिला सहकारी कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक का वित्तीय प्रबंधन एवं कृषि विकास में योगदान नीतियों खासतौर पर ऋण वसूली नीतियों पर केन्द्रित है। इस तरह अध्ययन जिले के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित बैंकों एवं उनकी ऋण वसूली नीतियों के गतिविधियों पर केन्द्रित है।

 

विषयवस्तु मे अनावश्यक विस्तार से बचने के लिए और सहकारी बैंक की ऋण वसूली नीतियों साख के शोध परिणाम हासिल करने के लिए अध्ययनकर्ता ने अध्ययन का केन्द्र विविध धर्मी जबलपुर जिले की सहकारी कृषि एवं ग्रामीण बैंक को बनाया गया है।  

 

शोध का महत्व एवं कठिनाइयॉः-

कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार है जिसके समुचित विकास के बिना किसी भी प्रकार की आम जीवन से जुड़ी विकास की गतिविधियों की परिकल्पना नहीं की जा सकती। विभिन्न स्रोतों से प्राप्त होने वाली जानकारियों के अनुसार देश का सर्वाधिक वर्ग कृषि से संबंधित है देश की कृषि व्यवस्था और कृषि नीति ऐसी है कि कृषि अभी भी पुरातन नीतियों पर आधारित है शासन और प्रशासन स्तर पर दीर्घकालिक सहकारी बैंकिंग नीतियॉ निर्मित होती है। जिनका संबंध कृषि क्षेत्र की वास्तविकता से नहीं होता। कोरे सिद्धंात पर आधारित सहकारी बैंकिंग की नीतियों के चलते कृषि आज भी नई परम्पराओं को स्वीकार नहीं कर पाती। देश के कुछ क्षेत्रों को अगर छोड़ दे तो कृषि फर्म और कृषक का नाम आते ही एक विचित्र पीड़ा का बोध होता है। भारत का किसान आज भी दो जून की रोटी के लिए मोहताज है उर्वरताविहीन खेत, लगातार घटते कृषि संसाधन, पढ़े लिखे विकासशील लोगों का कृषि से दूर हटना भौतिक संसाधनों की बढ़ती कीमतें समय अनुकूल बीज खाद एवं अन्य सहायक वस्तुए कृषि यंत्रों की भारी कीमतें उत्पादन विक्रय की साख की नीति का आभाव आदि के चलते जबलपुर जिले की कृषि अभी भी अधोगामी है।

 

भारत वर्ष सदैव जड़ी-बूटियों का गढ़ रहा है। एक अनुमान के अनुसार भारतीय उप महाद्वीप में जड़ी-बूटियों की लगभग 1500 ऐसी प्रजातियाँ पाई जाती हे जिन्हें विश्व भर में विभिन्न दवाइयों के निर्माण हेतु प्रयुक्त किया जाता है। यहाँ तक कि ब्रिटिश फार्माकोपिया में वर्णित विभिन्न दवाइयों के निर्माण में लगने वाली जड़ी-बूटियों में से 50 प्रतिात जड़ी-बूटियाँ दक्षिणी हिमालय क्षेत्र में पाई जाती है। विश्व संरक्षण संघ ;ॅवतसक ब्वदेमतअंजपवद न्दपवदद्ध के अनुसार विश्व भर में प्रति वर्ष लगभग 800 बिलियन डॉलर मूल्य की जड़ी-बूटियों का व्यापार होता हे जिसमें से कुल यूरोपीय माँग के लगभग 12 प्रतिशत की आपूर्ति भारतीय उप महाद्वीप से होती हें। इस प्रकार भारतीय महाद्वीप में ऐसे अनेक औषधीय पौधे हें जिनकी केवल विदेशी बाज़ारों में पर्याप्त माँग हे बल्कि जिनका देशीय बाज़ारों में भी काफी बड़ी मात्रा में व्यापार हो रहा हें हमारे देश में जिन जड़ी-बूटियों का व्यापार बहुतायत में हो रहा हे उनमें प्रमुख निम्नलिखित है-

 

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20 ls 25 djksM+

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6 ls 7 djksM+

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10 ls 12 djksM+

'ka[kiq’ih

2 ls 3 djksM+

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7 ls 8 djksM+

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4 ls 5 djksM+

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2 ls 3 djksM+

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6 ls 8 djksM+

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2 ls 3 djksM+

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1-5 ls 2 djksM+

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2 ls 5 djksM+

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1 ls 1-5 djksM

óोत- एग्रीकल्चर एण्ड इन्डस्ट्री सर्वे, नवम्बर 2011

 

इस प्रकार पिछले एक दशक में हर्बल उत्पादों के क्षेत्र में आई क्रांति के फलस्वरूप ओषधीय पौधों की खेती तथा इनसे जुड़े व्यवसायों को भारतीय अर्थव्यवस्था को एक नया मोड़ देने में सक्षम माना जाने लगा हेै।

 

भारत से औषधीय पौधों का निर्यात (करोड़ रूपयों मे )

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fu;kZr ¼djksM+ esa½

o`f) dk izfr'kr

2000-01

576

-

2005-06

725

125.86

2010-11

6,000

1041.67

2016-17

14500

2513.36

2019-20

18655

3238.71

óksr& NMPB New Delhi

 

तालिका क्रमांक 2 से यह स्पष्ट है कि भारत से औषधीय पौधों के निर्यात में तीव्र गति से वृद्धि हो रही है। वर्ष 2000-1 में जहाँ निर्यात मात्र 576 करोड़ रूपये का था, वर्ष 2016-17 में 14500 प्रतिशत एवं 2019-20 में 18655 करोड़ बढ़ी है जिसका प्रतिशत 3238.71 रही है। एक्ज़िम बैंक की रिपोर्ट के अनुसार भारत का निर्यात व्यापार घरेलू बाज़ार की तुलना में अधिक तेज़ी से बढ़ रहा है जो सारणी क्र. 03 में दर्शाया गया है।

 

औषधीय पौधों में भारत का घरेलू बाज़ार में व्यापार (करोड़ रूपयों में)

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fu;kZr ¼djksM+ esa½

o`f) dk izfr'kr

2000-01

544

&

2005-06

1050

193.01

2010-11

3,100

569.85

2016-17

13,000

2389.71

2019-20

15,575

2663.05

óksr& NMPB New Delhi

 

तालिका क्रमांक 3 से यह स्पष्ट है कि भारत के घरेलू बाज़ार में भी औषधीय पौधों के व्यापार में वृद्धि संतोषजनक है। वर्ष 2000-01 में 544 करोड़ रूपये का व्यापार था जिसके वर्ष 2016-17 में 13000 करोड़ रूपये एवं 2019-20 में 15575 करोड़ दर्ज किया गया है। किन्तु यह वृद्धि निर्यात व्यापार की तुलना में बहुत कम है।

 

निष्कर्ष

आधुनिक समय में किसी भी वस्तु का उत्पादन केवल उपभोग के लिये ही नहीं वरन् विक्रय के लिये भी किया जाता है। बड़े पैमाने पर वस्तुओं का उत्पादन किये जाने से विपणन का क्षेत्र राष्ट्रीय से अन्तर्राष्ट्रीय हो गया है। वर्तमान उदारीकरण एवं वैश्वीकरण के युग में भी आर्थिक व्यवस्था का एक पहलू उत्पादन है तो दूसरा उसका विपणन है। राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में कृषि उपज के विपणन का भी उतना ही महत्व है जितना कृषि उपज के उत्पादन का, क्योंकि भारतीय कृषि का स्वरूप आर्थिक विकास के साथ-साथ बदलता जा रहा है। अतः वर्तमान में समस्या वस्तुओं के उत्पादन की रहकर उसके विपणन की है। कृषि विपणन तकनीकी में सुधार, कृषि उत्पादन में वृद्धि, मध्यस्थों की समाप्ति, कृषि विनिमय हेतु वित्तीय सुविधाएॅ, कृषि उत्पाद मूल्य में वृद्धि तथा कृषि विपणन का व्यावसायिक कार्य, व्यवसायिक अनुभव, पूॅजी निवेश, छोटे कृषि व्यापारियों को संरक्षण कृषि के लिए वित्तीय सुविधाएॅ, व्यावसायिक प्रशिक्षण, यातायात का विकास, भण्डारण प्रक्रिया में सुधार, व्यावसायिक स्थिति का मूल्यांकन, मूल्य में स्थिरता जैसे अनुकूल प्रभाव पड़ेगा। कृषि विपणन में जमाखोरी की समाप्ति, कृषि क्षेत्र को औद्योगिक क्षेत्र मानने के साथ-साथ गांवो में कृषि उत्पाद के विक्रय हेतु आवश्यक सुविधाएॅ प्रदान करने का प्रयास होगा। कृषि विपणन क्षेत्र में सहाकरी समितियों के विकास हेतु कृषि विपणन क्षेत्र में सहकारी समितियों के विकास हेतु सरकारी एजेन्सी द्वारा कम मात्रा का पूर्व निर्धारण उत्पादक व्यापारियों से कृषि आय में वृद्धि जैसे उपायों को अपनाने से कृषि विपणन तथा कृषि उपज में उत्तरोत्तर वृद्धि होगी। कृषि उपकरणों वित्तीय सुविधाओं में वृद्धि के साथ ही अन्य आवश्यक मूलभूत सुविधाओं में विकास हेतु उपाय किये जायेगे। सहकारी विपणन व्यवस्था को प्रोत्साहन दिया जाएगा उत्पादको को उचित मूल्य दिलाए जाने के साथ ही पूंजीवादी बाजार को रोकने का प्रयास किए जाएगा, साथ ही कृषि विपणन व्यवसाय का विस्तार किया जाएगा, विस्तार के साथ ही देश वे अन्य विकसित राज्यों की कृषि विपणन के समान किया जाएगा।

 

संदर्भ ग्रंथ सूची %&

1-    अग्रवाल एन.एल., भारतीय कृषि का अर्धतंत्र, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी,

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3-    चौहान, शिवध्यान सिंह भारतीय व्यापार साहित्य भवन प्रकाशन, आगरा

4-    चतुर्वेदी टी.एन. तुलनात्मक आर्थिक पद्धतियॉ राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी जयपुर

5-    जैन, पी.सी. एवं जैन टेण्डका विपणन प्रबंध नेशनल पब्लिशिंग हाउस नई दिल्ली

6-    खंडेला मानचन्द्र, उदारीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था साहित्य भवन प्रकाशन आगरा

7-    मदादा एवं बोरवाल विपणन के सिद्धान्त रमेश बुक डिपो जयपुर

8-    जबलपुरस्तव, पी.के. विपणन के सिद्धान्त नेशलन पब्लिशिंग हाउस नई दिल्ली

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11-  वान हेबलर, गाट फ्रायड, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का सिद्धांत .प्र. हिन्दी सस्थान

 

 

 

Received on 30.03.2023         Modified on 08.04.2023

Accepted on 16.04.2023         © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences. 2023; 11(1):41-47.

DOI: 10.52711/2454-2679.2023.00007