दक्षिण छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी

(ज्ञात, अल्पज्ञात तथा अज्ञात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी)

 

डाॅ. कुबेर सिंह गुरूपंच

प्राचार्य, देव संस्कृति कालेज आॅफ एजुकेशन एण्ड टेक्नोलाॅजी खपरी धमधा रोड, दुर्ग (..) 491001

*Corresponding Author E-mail: kubergurupanch@gmail.com

 

ABSTRACT:

प्रस्तुत शोध पत्र- दक्षिण छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी (ज्ञात, अल्पज्ञात तथा अज्ञात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी) के योगदान का अध्ययन करना है, तथा छत्तीसगढ़ के इतिहास में उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व के बारे में जानकारी प्रदान करना है, इसके साथ ही पाठ्यक्रमों में उनके किये गये योगदान का समायोजन करना है।

 

KEYWORDS: छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता, संग्राम सेनानी.


 

प्रस्तावना -

सन् 1858 से 1900 तक छत्तीसगढ़ में जन आंदोलन देष की राजनीतिक स्थिति के साथ सम्बद्ध रही। इस अंचल के साहित्यकारों ने जनता को जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाबू राम ने इतिहास और साहित्य के माध्यम से (1858), धमतरी के काव्योपाध्याय हीरालाल में (1880 में) छत्तीसगढ़ी व्याकरण लिखकर, पं. शंकरदत्त मिश्र ने रतनपुर अंचल मंे अपने जोषीले विचारों को प्रवचन के माध्यम से व्याख्यान के माध्यम से एवं पं. माधवराव सपे्र तथा चिंचोलकर ने पेंड्रारोड जैसे अरण्यांचल से छत्तीसगढ़ मित्र निकाल कर बौद्धिक जागृति उत्पन्न की।

 

1858 से सन् 1900 तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के होने वाले अधिवेषनों से यहाँ के लोग प्रभावित हुए। मेघावाले, गनोदवाले, सपे्र परिवार के लोग इसमें सम्मिलित होते रहे। सन् 1900 से 1920 तक छत्तीसढ़ में लोकमान्य बालगंगाधर तिलक का व्यापक प्रभाव था। 1905 के बंग भंग आंदोलन ने यहाँ के नवयुवकों में जोष भर दिया। चमसुर राजिम के पं. संुदर लाल षर्मा विषेष रूप से सक्रिय थे। 1906 के स्वदेषी एवं बायकाट का भी यहाँ प्रभाव पड़ा। लेख में ज्ञात, अल्पज्ञात, अज्ञात भूले बिसरे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों पर शोध किया जा रहा है। सचमुच, वे अंधेरे में है। सम्मान तो दूर जीवन व्यापन के लिए दर-दर ठोकरे खा रहे हैं।

 

अध्ययन का उद्देश्य-

प्रस्तुत शोध पत्र- दक्षिण छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी (ज्ञात, अल्पज्ञात तथा अज्ञात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी) के योगदान का अध्ययन करना है, तथा छत्तीसगढ़ के इतिहास में उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व के बारे में जानकारी प्रदान करना है, इसके साथ ही पाठ्यक्रमों में उनके किये गये योगदान का समायोजन करना है।

 

कण्डेल नहर सत्याग्रह से शुरू हुआ विद्रोह -

कण्डेल ग्राम धमतरी अंचल का जागरूक गांव था। बाबू छोटेलाला श्रीवास्तव वहाँ के माल गुजार थे। दमन स्वरूप अंग्रेजों ने वहाँ के किसानों दर नहर से पानी चुराने (सावन की रात में भयंकर बारिष हुई) का आरोप लगाकर अर्थ दण्ड लगाया। अंग्रेजों ने उनके मवेषी नीलाम करने चाहे। स्वयं सेवकों की सक्रियता के कारण बाजार में कोई खरीददार मिला। जब अंग्रेजों को पता चला कि कण्डेल नहर सत्याग्रह के मार्ग दर्षन के लिए महात्मा गांधी को लाने पं. सुंदरलाल षर्मा कलकत्ता गए हैं तब उन्हें किसानों के अडिग रवैय्या के समक्ष अर्थ दण्ड वापस ले लिया और गाँधी के आने के पूर्व किसानों की जिद्द से कण्डेल नहर सत्याग्रह सफल रहा वास्तव में यह बिहार के चम्पारन, गुजरात के बारडोली के मध्य कड़ी के रूप में महत्वपूर्ण किसान आंदोलन था

 

20 दिसम्बर, 1920 को छत्तीसगढ़ में प्रथम बार महात्मा गांधी रायपुर आए और धमतरी आये। कण्डेल नहर सत्याग्रह के सफल संचालन हेतु जनता को बधाई दी। वस्तुतः कण्डेल का आंदोलन असहयोग आंदोलन का पूर्वाभ्यास सिद्ध हुआ। यहाँ से जाने के बाद दिसम्बर अंतिम सप्ताह में नागपुर कांग्रेस में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन में निर्णय लिया

 

देश को गांधीजी ने सर्वप्रथम सत्याग्रह का मार्ग सुझाया। आगे चलकर सत्याग्रह भारतीय स्वातंन्न्य आंदोलन का अमोघ अस्त्र साबित हुआ। सन् 1920 मे मध्य में छत्तीसगढ़ में भी सत्याग्रह आंदोलन का सूत्रपात हुआ। जुलाई माह में धमतरी तहसील के कण्डेल नामक ग्राम में नहर सत्याग्रह आरंभ हुआ। इस सत्याग्रह के सूत्रधार थे पं. सुंदरलाल शर्मा, नारायण राव मेघावाले तथा छोटेलाल बाबू। सत्याग्रह छिड़ने के निम्नलिखित मुख्य कारण थेः-

·         नहर विभाग द्वारा इस गांव के निवासियों पर चोरी का झूठा आरोप लगाया जाना

·         नहर विभाग द्वारा गांव के निवासियों से जबरन नाजायज ढंग से जुर्माने की रकम वसूल करना।

·         जुर्माने की रकम वसूल करने के लिये ग्रामवासियों पर अत्याचार करना

 

नहर विभाग के अत्याचारों का विरोध करने के लिये जुलाई माह में इसी गांव में एक सभा हुई जिसे पं. संुदरलाल षर्मा, नारायण राव मेघावाले तथा छोटेलाल बाबू ने संबोधित किया। इसी सभा में अंग्रेजी नौकरषाही के अत्याचारों के विरूद्ध सत्याग्रह करने की घोषणा की गई और यह भी निर्णय लिया गया कि गांव में कोई भी व्यक्ति जुर्माने की रकम शासन को दे। फलस्वरूप गांववालों की मवेषियां कुर्क कर ली गई। जब ये मवेषियां बाजारों में नीलाम करने के लिए ले जायी जातीं तब वहां सरकारी कर्मचारी को कोई बोली बोलने वाला नहीं मिलता। इस प्रकार यह सत्याग्रह दिसम्बर माह तक चलता रहा। साथ ही अंग्रेजों का दमन चक्र भी बढ़ता गया।

 

धमतरी में महात्मा गांधीजी

पं. सुंदरलाल शर्मा जी, राजिम वाले, महात्मा गांधी को धमतरी में लाने के लिए 2 दिसम्बर सन् 1920 . को कलकत्ता गये थे किन्तु वहां उनसे भेंट नहीं हो सकी। इसका प्रधान कारण यह था कि इस अवधि में महात्मा गांधी कलकत्ता कांग्रेस विषेष अधिवेषन में असहयोग आंदोलन विषयक जो प्रस्ताव स्वीकृत हुआ था वह कांग्रेस अधिवेषन में, जो 26 दिसम्बर, 1920 को नागपुर में प्रस्तुत होने को था, का समर्थन प्राप्त करने के अभिप्राय से भारतवर्ष में सर्वत्र उसके अनुकूल वातावरण उत्पन्न करने को वहां से प्रस्थान कर चुके थे। अतएव षर्माजी को उनके पीछे ही प्रवास करना अनिवार्य हो गया जिसमें उन्हें अधिक दिन लगना स्वाभाविक था। अंत में उनसे दक्षिण भारत के एक नगर में जहां महात्माजी का कार्यक्रम अधिक दिनों के लिये निष्चित था, वहां भेंट होना संभव हुआ। वे गांधीजी को धमतरी तहसील के कण्डेल गांव के नहर सत्याग्रह का पूर्ण परिचय कराकर धमतरी में लाने में सफल हुए। गांधीजी धमतरी में 2 बार आये। एक बार कंडेल सत्याग्रह के दौरान, सन् 1920 में और दूसरी बार 24 नवंबर सन् 1933 में उनका आगमन हुआ।

 

     उमर सेठ अल्पज्ञात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी

21 दिसम्बर, 1920 . को ठीक 11 बजे दिन को महात्मा गांधी मौलाना शौकत अली के साथ, रायपुर होते हुए यहां पधारे। धमतरी में महात्माजी के दर्षन तथा उनके सामयिक भाषण को सुनने के लिये तहसील के प्रत्येक भाग तथा गांवों से असंख्य स्त्री तथा पुरूष नगर के प्रमुख द्वार मकईबन्ध चैक से सभा स्थल तक ही नहीं वरन् नगर के डेढ़ मील लम्बे सड़क के दोनों ओर वन्देमातरम्, भारत माता की जय, तथा महात्मा गांधी की जय आदि ध्वनियों से गुंजाकर उनके धमतरी आगमन के उल्लास में उनका हार्दिक अभिवादन कर, उनके तथा देष के प्रति अपनी सच्ची भावनाओं को प्रकट करते हुए खड़े थे। पूर्व से ही महात्मा गांधीजी के भाषण का प्रबंध यहां के एक प्रसिद्ध सेठ हुसेन इमामबाड़ा के वृहत् बाड़े में निष्चित हुआ था, इसलिये उनकी खुली कार असंख्य नर-नारियों के झुंड को पार करती हुई सीधी वहां पहुंची, किन्तु इस सभा स्थल के प्रमुख द्वार पार करना, असंभव देखकर गुरूर निवासी श्री उमर सेठ नामक, एक कच्छी व्यापारी झट महात्माजी को उठाकर और अपने कंधों पर बिठाकर सभास्थल के एक सुसज्जित तथा सुरम्य मंच पर पहुंचाने में सफल हुआ

 

यह स्थान भी उनके पहुंचने के पूर्व ही असंख्य स्त्री तथा पुरूषों से ठसाठस भरा हुआ था। इससे अधिकांषजनों को निकटवर्ती स्थानों भवनों की छतों पर खड़े होकर अपनी उमंगे पूर्ण करनी पड़ीं। जो मंच महात्माजी के बैठने के लिये निर्मित किया गया था, वह अति सुंदर तोरणपताकाओं तथा देषभक्त नेताओं के चित्रों और षिक्षाप्रद एवं देषभक्ति सूचक वाक्यों की लिखावट आदि से चहुं ओर से एक कलात्मक ढंग से सुसज्जित किया गया था। महात्माजी के आसन ग्रहण करने के पष्चात् नगर निवासियों की ओर से सर्व प्रथम यहां के एक बड़े प्रमुख तथा प्रतिष्ठित मालगुजार श्रीमान् बाजीराव जी कृदत्त महोदय के हाथ से 501 रू. अंकन पाँच सौ एक रूपये की थैली भेंट कर उनका हार्दिक स्वागत किया गया। जिस उद्देष्य तथा भावना से प्रेरित होकर महात्माजी को यहां लाने का प्रयास किया गया था, वह ईष्वर के कृपा से फलीभूत हो गया था। इससे जनसाधारण तथा प्रमुख पुरूषों के आनंद तथा उत्साह में वृद्धि होना स्वाभाविक ही था।

 

महात्माजी ने देष की सामयिक परिस्थितियों का सुंदर चित्रण करते हुए हिन्दी भाषा में लगभग 1 घंटे तक भाषण किया जिसमें कण्डेल गांव के नहर सत्याग्रह तथा उसके पे्ररक पं. सुंदरलाल षर्मा, पं. नारायण रावजी मेघावाले, श्री नत्थूजी जगताप तथा श्री छोटेलाल बाबू आदिजनों का उल्लेख करते हुए उपस्थित जन समुदाय को संबोधित कर कहा कि अन्याय तथा अत्याचार का सामना संगठन दृढ़ता तथा सत्यता के साथ सतत् अहिंसात्मक तथा शांतिमय नीति का अवलम्बन करने से ही देष का भविष्य उज्जवल हो सकता है और इनमें ही देष की उन्नति सन्निहित है। यह आप लोग निष्चित समझो। इसके पष्चात् लगभग 12 बजे दिन को सभा का कार्य समाप्त हुआ। अब यहां से महात्माजी श्री नत्थूजी जगताप के भवन पर फलाहार करने तथा नगर के प्रमुख राजनैतिक तथा प्रतिष्ठिजनों जिनमें श्रीमान् बाजीरावजी कृदत्त, दाऊ डोमार सिंहजी, नन्द वंषी, गुसाई किषनगीरजी, श्री रघुनाथ रावजी जाधव, सेठ हंसराज तेजपाल जी, सेठ सोहनलाल मुंषीलालजी, श्री बीरजी भाई, मोहम्मद अब्दुल करीमजी, श्री मोहम्मद अब्दुल हकीमजी, वकील दाऊ छोटेलाल जी, श्री भांजी भाई ठेकेदार, श्री बदरूद्दीनजी मालगुजार, श्री सेठ उस्मान अब्बाजी के नाम विषेष उल्लेखनीय हैं, को देष की वर्तमान परिस्थिति पर ध्यान देकर उन्हें देष को उद्धार करने विषयक कांग्रेस के कार्यक्रमों में भाग लेने का आग्रह कर गांधीजी लगभग दो बजे दिन को यहां से रायपुर के लिये प्रस्थान किये। इस तरह तीन चार घंटे के लिये यह नगर महात्माजी के आगमन पर आनंद विभोर में मग्न रहा

 

छत्तीसगढ़ में यह सत्याग्रह रायपुर, धमतरी, आरंग, गनौद, दुर्ग, महासमुंद, बालोद, राजिम, नांदगांव, बिलासपुर, कांकेर, डौंडी, भानुप्रतापपुर, जगदलपुर, नेवनार आदि स्थानों पर भी चला। बाबू छोटेलाल, पं. सुंदरलाल शर्मा, लालजी भाई, नत्थूजी जगताप, नारायण राव मेघा वाले, सिघोरी वाले हिषीकर, डाशावाले, खरथुली वाले, हसदा वाले, किरवई वाले, गनोद वाले, खंुदनी वाले, डोमार सिंह दाऊ, परसुली वाले, लीलर वाले आसपास के वालों ने जनजागृति का महत्वपूर्ण कार्य किया, धमतरी के गांवों से भीड़ उमड़ पड़ी थी। गांधीजी ऐसे ही बुलाया करते थे, इसीलिये मालगुजार गांवों के नामों से प्रसिद्ध हो गये।

 

धमतरी कुरूद से वापस लौटने के बाद पुनः रायपुर में रूके और महिलाओं की एक सभा को संबोधित किया। महिलाओं ने तिलक स्वराज्य फण्ड हेतु हजारों के गहनें स्वस्फूर्ति दिये और उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन में जूझने की पे्ररणा दी

 

     आजादी के कुछ क्षेत्रीय सिपाही

सन् 1920 में धमतरी में नगर पालिका थी, तब से लेकर आज तक .पा. की स्मारिका में उमर सेठ का नाम दर्ज नहीं किया गया है। सन् 1906 में दुर्ग जिला बना। दुर्ग जिले में भी उनका नामोनिषान नहीं है क्योंकि गुरूर-दुर्ग जिले में समाविष्ट हो गया। बालोद जिला तो अभी-अभी बना है। गुरूर के आसपास भी सैकड़ों-हजारों लोगों ने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया और जेल भी गये, लेकिन उनका उजागर नहीं किया गया। एक तरह से गुरूर को दुर्ग जिले का अंतिम छोर माना जाता रहा है। सरकारी अभिलेख के अनुसार जेल गये कुछ सैनिकों के नाम यहां दिये जा रहे हैं -

  बालोद से - लखनलाल सुखऊ प्रसाद -बालोद -  26.07.42 से 20.03.43

  अयोध्या प्रसाद रामचंद्र - अखराभाटा           -      14.04.42 से 14.06.43

  सांकरा - छत्तरसिंह माहरा               -      29.09.42 से 05.04.43

  घनाराम धनीराम                        -      17.10.42 से 26.03.43

  शिवदयाल साधुराम                      -      17.10.42 से 26.03.43

  शोभाराम भागीरथी                      -      17.10.42 से 26.03.43

  बालोद - गोकुल कन्हाई                 -      29.08.42 से 14.09.43

  डोटोपार - सहसूराम रतन               -      09.11.42 से 16.04.43

  बरही - रामलाल ऊर्फ शरणानंद         -      22.02.32 से 15.07.32

  अरमरी कला - पता लगा है कि कोई रजोलीमोखा का साहू जिसके सुपुत्र चिंताराम साहू है वो भी स्वतंत्रता संग्राम था

  उमरसेठ - गुरूर - इनका जेल जाने का कोई अभिलेख नहीं है। जिसने महात्मा गांधी को कंधों पर बिठाया, उसका सरकारी आंकड़ों में कहीं नाम तक नहीं है

  लिखे लड़ाई धमतरी राज के

जतका मोला सुरता आय

धमतरिहा मन बड़ चटपटिहा

सन् 20 में गांधी ला लाये ।।

उमरसेठ के बारे में या उनके परिवार के बारे में ठीक-ठीक पता लगाना मुष्किल है। फिर भी इतिहास की एक पंक्ति ने सोते से जगा लिया है। अनुमान है कि उमर नामक सेठ कच्छी व्यापारी था। घोड़े के व्यवसाय के अलावा वह दैनिक उपभोग की वस्तुओं का व्यापार किया करता था। जाहिर है कि उसने शानदार घोड़ा रख छोड़ा था। यह आवष्यक भी था कि क्यांेकि गुरूर से धमतरी जाने-आने पर तीन नाले पड़ते थे। संभवतः स्व. प्रताप चंद्र खत्री, स्व. भीमराज, स्व. केषवराव, स्व. माधवराव पतंगीवार, स्व. भोदूराव, स्व. महोबिया (बरई) डाॅ. दौलत सबने उमरसेठ का व्यापार आंखों से देखा होगा।

 

     महात्मा गांधी आये, तब क्या हुआ -

तब तो सारी भीड़ धमतरी में जमा हो गई। सौ साल पहले गुरूर के सौ गांव ही आबाद थे। सारी भीड़ बच्चे, युवा, प्रौढ़, सियान गांधी बबा देखने धमतरी चल पड़े। उमर सेठ ने सोरिद में घोड़ा बांधा। फिर ग्रामीणों के साथ बबा को देखने चल पड़ा

 

महात्मा को जरा सा विलंब हुआ। तब तक भीड़ बढ़ती ही जा रही थी। आये-आये महात्मा कार के पास भी भीड़। कैसे निकले महात्मा ? तब गुरूर के उमर सेठ कार के समीप पहुंचा। उसने महात्मा के साथ थोड़ी सी बातचीत की। कंधे पर ले जाने हेतु अनुनय विनय किया।

 

     गांधी संग शौकत भइया

मोहम्मद अली विराजिन आय

भाषण काये मंन्तर फूंक देईन

धमतरी चेला लेईन बनाय ।। (स्व. शंकर लाल सेन)

महात्मा ने सहर्ष स्वीकार कर हां में सिर हिलाया। फिर एक किमी उमर सेठ के कंधों पर बापू आराम से चहंु ओर देख रहे थे। यह कितनी आष्चर्य था

 

     आंसू बहाने वाला कोई नहीं -

गुरूर में उमर सेठ की कहानी पर आंसू बहाने वाला कोई नहीं है। नेता और प्रतिनिधि क्या इस कहानी से कोई सबक लेंगे। उमर सेठ का क्या हुआ। वह अल्पज्ञात सषक्त स्वतंत्रता सेनानी था जिसका विवरण किताबों मे दर्ज नहीं है। राष्ट्रीय संघर्ष आंदोलनों में भाग लिया करता था। सरकार तो उन्हीं को सेनानी मानती है, जो कारावास भुगतते हैं। उमरसेठ की जेल जाने का कोई प्रमाण नहीं है।

 

     बद्रीप्रसाद गुप्ता: ज्ञात सेनानी -

देष के लिये जेल जाने वाले, अंग्रेजों की यातनायें सहने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भटक रहे हैं। अपना राज्य छत्तीसगढ़ बनने के बाद भी स्थिति सुधरी नहीं है। शासन-प्रषासन सुध नहीं लेता। गुरूर के एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की यही दास्तान है। सेनानियों को मिलने वाली सुविधायें बद्रीप्रसाद गुप्ता को मिली या नहीं मिली, ये बात तो मालूम नहीं हुई, लेकिन उनके परिजनों ने बताया कि वे जेल गये थे। स्मरणीय है कि बद्रीप्रसाद गुप्ता ने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय योगदान दिया था। उनका घर बाजार चैक वार्ड नं. 3 गुरूर में स्थित है। गत तीन पीढ़ियों में यह परिवार यहाँ रहता आया है। प्रमाण पत्र परिजनों के पास मौजूद है। 24 मई 1982 को बद्रीप्रसाद गुप्ता का निधन हो गया।

 

     स्वामी शरणानंद -

धमतरी-बालोद मुख्य सड़क पर स्थित सांकरा से 3 किमी. दूरी पर बरही ग्राम बसा है। पूरब दिषा के शोलापठार और यहां के ग्वालिन भाठा पठार के मध्य विषालकाय पाषाणों की एक श्रृंखला सी बन गयी है। पेड़ पौधों की हरितिमा के बीच यहां एक सुरम्य जलाषय बना हुआ है। जलाषय को वैसे दर्रेटोला जलाषय कहा जाता है। परंतु बरही के करीब होने के कारण यह बरही जलाषय भी कहलाता है। बरही गांव के नामकरण के पीछे प्राचीन मान्यता है। सात गांव का एकसतहोराजा का राजस्व वसूल करता था। 12 गांवों के केन्द्र में राजा का एक प्रतिनिधि बरहों होता था। जमींदारी, मालगुजारी और टकौली वसूल करने की प्रथा समाप्त होने के साथ-साथबरहोपर भी खत्म हो गया। परंतु गांव का नाम अपभ्रंष होते होतेबरहीहो गया।

 

एक बार स्वामी शरणानंद दक्षिण के वनप्रांत से दिषाटन करते-करते बरही के समीप की गुफा और कंदराओं में पहुंचे। यहां की हरितिमा, पक्षियों का कलरव और गुनगुनाता झरना उन्हें भा गया। बस, वे वहीं पाषाणों के बीच धुनी रमाकर बैठ गये। बैठ गये सो बैठ गये। फिर कहीं और जाने का मन हुआ, यहीं गुफा के अंदर रहने लगे, थोड़े ही दिनों बाद उन्हें आभास हुआ कि चट्टानें बोलती है। पेड़-पौधें इठलाकर खेलते हैं पशु-पक्षी उन्हें उनके कार्य में सहयोग करते हैं।

 

उन्हें अपनापन लगा था और मिली अजीब सी शंति, कालांतर में बरही और समीप के अन्य भागों से ग्रामीण उनके समीप आते और भजन कीर्तन सुनते। किसी शुभ पर्व पर स्वामीजी गांवों में आमंत्रित किये जाने लगे। उनकी कीर्ति फैलने लगी। स्वामी, गुफा में ही कुटिया बनाकर रहने लगे और सम्मुख एक भगवान की पाषाण प्रतिमा स्थापित कर ली। आज स्वामी शरणानंद यहां नहीं है। 25 सितम्बर 1997 को उनका अवसान हो गया। परंतु उनकी स्मृतियां अभी भी शेष है। जिस अप्रिय स्थल को उन्होंने आकाष पाताल एक करके खोजा था, वह आज का अमूल्य धरोहर बन गया है।

 

·           सेनानी से साधू संत तक का सफर -

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·           नारा लगाने वाले नहीं रहे पर गाँव का नाम पड़ गया - नारागाँव -

जंगलों में बसा, पहाड़ियों से घिरा और झरनों का शोरगुल मचाना, सियादेवी माँ के चरणों में अर्पित गाँव नारागाँव। गाँव तो वैसी ही है, जैसे छत्तीसगढ़ के अन्य गाँव होते हैं। तथ्य प्रमाणित करते हैं कि पहले इस गाँव का नाम पेड़-पौधों पर रहा होगा। जब यहां षिक्षा सभ्यता ने कदम नहीं रखे थे। शनैः षनैः विकास होता गया। तीन सौ साल पहले जन-जागृति की किरणें पहुंची। यहां के निवासी व्यवसाय और धंधे अपनाने लगे। कृषक खेती किसानी करने लगे।

 

नारागाँव के किसानों ने गुलामी का दर्द भी सहा। अंग्रेजों की गुलामी असह्य होती थी। गाँव के लोगों की यही दास्तांन है। एक तो सिंचाई सुविधा उपलब्ध नहीं थी। खेती किसानी के लिये पानी की जरूरत पड़ती। तो पानी लेने के लिये मना कर दिया जाता था। गाँव निवासियों ने यातनायें खूब सही। जब अत्याचार किया जाने लगा, कि गाँव के चार नौजवान उत्तेजित हो गये और अंग्रेजों के विरूद्ध जेहाद छेड़ने का बिगुल बजा दिया। जहां-तहां ये जवान अंग्रेजों के विरूद्ध नारे लगाते फिरते। ये गाँव, आन गाँव, ब्लाॅक, तहसील और जिला। सब तरफ। घटना का पता विभिन्न स्त्रोतों से मालूम होता है। इन चार सेनानियों ने 19 अक्टूबर 1930 को जिला स्तर पर जल-सत्याग्रह आंदोलन में भाग लिया था। अंग्रेजों के विरूद्ध नारे लगाये थे। इसी तर्ज पर सिहावा, रूद्री, नवागाँव और कंडेल में भी सत्याग्रह आंदोलन हुआ था। अंचल के बहुत से किसानों ने इस आंदोलन में भाग लिया था। तब महात्मा गांधी दूसरी बार धमतरी आये थे।

 

नारागाँव के इस स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की क्रमषः नाम इस प्रकार है -

     सुकालू राम

     पीताम्बर

     बिसाहू राम

     सूरजू राम

 

जब महात्मा गांधी दूसरी बार धमतरी आये, तब अंचल के किसानों के साथ नारागाँव के सेनानी भी आंदोलन में भाग लेने गये थे। तब भीड़ को तितर-बितर करने के लिये अंग्रेजों ने दमन चक्र चलाया। सन् 19 अक्टूबर 1930 का लाठीचार्ज भूले नहीं भूलता। बन प्रयोग भी किया। भगदड़ मच गई। कुछ लोग मैदान में ही अचेत हो गये। बहुत से किसानों को जेल भेज दिया गया। किसानों के बीच नारागाँव के स्वतंत्रता सेनानी भी शामिल थे। चारों आंदोलनकारियों को जेल की हवा खानी पड़ी - सुकालू, पीताम्बर, बिसाहू और सूरजू। चारों सैनिक 24 दिन जेल में रहे। अंग्रेजों का दमन चक्र चलता रहा। 24 नवम्बर 1930 को इन चारों लोगों को जेल से छोड़ा गया।

 

जेल से छूटने के बाद इन्होंने आंदोलन जारी रखा। पं. सुंदरलाल शर्मा के नेतृत्व में चलने वाले सत्याग्रह संघर्षों में ये चारों शामिल हो गये। क्षेत्र के गाँव - गाँव जाकर अलख जगाई। लोगों को जागरूक किया। सुकालू, पीताम्बर, बिसाहू और सूरजू केवल आजादी के सिपाही थे, वरन् अच्छे कलाकार भी थे। गाँव- गाँव जाकर इन्होंने नाटकों का मंचन कर जन-जागरण किया।

 

देष को आजाद कराने में जिन सत्याग्रहियों ने जल सत्याग्रह किया, आंदोलन किया और 24 दिनांे तक जेल की यातनायें सही, उन सेनानियों को षासन ने विस्मृत कर दिया। बताया जाता है कि मान-सम्मान की बात तो दूर रही, उनकी पूछ-परख भी नहीं होती। उनकी पेंषन राषि भी नहीं दी जा रही है। परिजन भटक रहे हैं, कि किसके पास वो अपनी जिंदगी की दास्तान सुनावें। चारों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की मौत के बाद सुनने वाला कोई नहीं - मध्यप्रदेष, छत्तीसगढ़। बाकायदा इन चारों को जेल प्रमाण पत्र और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का प्रमाण पत्र मिला है।

 

पिछली सरकार ने एक योजना बनाई थी। छत्तीसगढ़ अंचल की महान विभूतियों को कर्मस्थली और जन्मस्थली का समग्र विकास करना और उनके उद्देष्यों को संरक्षित करने की योजना। अगर यह योजना क्रियान्वित की जाती है, तो नारागाँव के इन सेनानियों के परिजन का उद्देश्य पूर्ण होगा। कम से कम स्मारक बनाकर उनकी स्मृति को यादगार बनाया जावे। अन्यथा ये भटकते ही रहेंगे। नारा लगाने वाले तो अमर हो गये। चलिये एक बार फिर नारा लगायें -

 

भारत माता की जय

नारागाँव के सपूतों की जय।।

हाल प्रकाषित भूले बिसरे स्वतंत्रता सेनानी नामक पुस्तक में संग्रहित किया गया है कि बालोद जिले के 51, बलौदा बाजार के 22, जांजगीर-चांपा के 27, कांकेर के स्वतंत्रता सेनानियों ने जमकर मोर्चा संभाला था। इनमें -

 

     ढालसिंह दिल्लीवार        -      पिरीद

     हीरालाल सोनबोईर        -      भरदा

     उमेन्द्र सिंह                -      भरदाकला

     इंदरमन साहू       -      मोखा

     मेहतर राम                -      भाटागांव

     केजूराम                   -      गोरकापार

     साहसराम                 -      डोटोपार

     रामप्रसाद देषमुख         -      पिनकपाइ

     लक्ष्मण देषमुख            -      लोहारा

     वली मोहम्मद       -      बाघमार

     कंगला मांझी              -      बाघमार

     गेंदलाल                   -      गुंडरदेही आदि।

 

     जंगल सत्याग्रह: श्यामलाल सोम -

वर्ष 1922 में सिहावा के श्यामलाल सोम के नेतृत्व में जंगल सत्याग्रह शुरू हुआ। उन्होंने इस आंदोलन में भरपूर सहयोग दिया। सन् 1930 में रूद्री नवागांव स्थान पर सत्याग्रह किया गया। उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। कड़ी यातनायें दी गई। नगरी क्षेत्र के ग्राम उमरगांव को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का गांव कहा जाता है। आंदोलन की खुषबू आज भी महकती है यहां। गांव के 29 लोगों को बंेत मारने की सजा दी गई, उन्हें जेल में डाल दिया गया।

 

     सुखराम नागे -

हिंच्छापुर में स्वतंत्रता सेनानी सुखराम नागे की वीरता की कहानी गूंजती है। वे क्रांतिकारी थे। जंगल में भाग लिया। आजादी मिलते तक वे कदम से कदम मिलाकर चलते रहे। वनवासियों को उनका अधिकार दिलाया। उनका मठ जर्जर होने लगा है। सन् 1959 में उनका निधन संदिग्ध परिस्थितियों में हो गया।

 

     रोहिणी बाई -

सन् 1942 के आंदोलन में रोहिणी बाई को कारावास हुआ। राधाबाई के नेतृत्व में और भी महिलाओं को जेल में ठूंसा गया - गया बाई, मनटोरा बाई, भगवती बाई और ममा दाई। उस समय रायपुर जेल में 24 महिलाओं कैद थी। ये सब महिलायें गांधीजी के धमतरी आगमन पर साथ-साथ थी। अब आगे चलें। बस्तर में षहीद गेंदसिंह का स्वतंत्रता उद्घोष चिंनगारी की तरह फैला हुआ था। आजादी की आंधी ने कांकेर को झकझोर कर रख दिया था। दासता से छुटकारा पाने के लिये हर कोई बलिदान देना चाहता था।

 

 

 

     इंदरू केवट -

गंेदसिंह के बलिदान से इंदरू केवट प्रभावित थे, उनके पद चिन्हों पर चलकर आंदोलन का नेतृत्व किया। वे सुरंगदाह के निवासी थे। इंदरू के विचार पहले क्रांतिकारी था, बाद में गांधीजी का आदर्श उन्होंने अपनाया - सत्य अहिंसा। विद्रोह और अंग्रेजों के खिलाफ हो गये। गोरों ने इन्हें पकड़ना चाहा, तो नदी में कूद गये। अमर शहीद इंदरू केवट नाम स्वर्णाक्षरों से लिखा जाता है। कांकेर रियासत के गांधी बन गये हैं। आज भी महात्मा गांधी द्वारा इंदरू केवट को दिया गया तिरंगा झंडा इनके घर साबूत है।

 

इसी धरती पर कंगलू कुम्हार स्वतंत्रता सेनानी पैदा हुआ, जिसने अंग्रेजों के दांत खट्टे किये। सन् 1920 में कंडेल सत्याग्रह में भाग लेने तीनों साथी कंगलू कुम्हार, इंदरू केवट और सुखदेप वातर पैदल-पैदल धमतरी गये थे। ग्राम कोलर निवासी चिंतू हल्बा ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की थी। उसे सजा भी हुई थी। कहा जा रहा है कि भूमकाल आंदोलन के दौरान सजा हुई थी, यह मान्य नहीं है। इसे सेनानी नहीं कहा जा सकता।

 

     गैंदसिंह -

अंग्रेजों और मराठों के खिलाफ विद्रोह करने वाले प्रथम शहीद थे - परलकोट के जमींदार शहीद षिरोमणी गैंदसिंह, जिन्हें अंग्रेजों ने 20 फरवरी 1825 को परलकोट स्थित महल के सामने ही फांसी पर लटका दिया। गैंदसिंह शोषण और अत्याचार के खिलाफ लड़ रहा था। अब तक गैंदसिंह को कोई सम्मान नहीं मिला। लिमोरा (बालोद) की डारन बाई गोड़िन भी स्वतंत्रता सेनानी थी। उसे अच्छा सम्मान मिला। वह प्रथम विधायक मनोनीत की गई।

 

कंगला मांझी: ज्ञात चिरपरिचित सेनानी -

कंगला मांझी का जन्म कांकेर जिले के तेलावट ग्राम में हुआ था। पिता का नाम रैनू मांझी और मां का नाम चैती बाई था। छुटपन में शादी हो गई। बिरझा देवी उनकी पहली पत्नी बनी। दूसरा ब्याह सन् 1965 में हुआ। कोयसूर परिवार की पढ़ी-लिखी उन्हें मिली, नाम था फुलवा देवी।

 

गोंडवाना गौरव, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, क्रांतिकारी, गरीबों, कोयतूरों किसानों के मसीहा सामाजिक कार्यकर्ता, आजाद हिन्द फौज के संस्थापक, अंग्रेज विरोधी, अधिकारों के लिय लड़ने वाले, बस्तर का हीरा, सचमुच हीरा सिंह देव कांगे - यही आगे चलकर कंगला मांझी बन गया। समाज की विपन्नता और अपना कंगाली भरा जीवन देखकर उसने स्वयं को कंगला घोषित कर दिया।

     उसने आजादी की लड़ाई लड़ी

     जेल गये - स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बने

     उसने कहा - धरती का मालिक कोयतूर ही है

     हम अपना जल, जंगल और जमीन नहीं देंगे

     अंग्रेजों ने कहा - हमें कोई हरा नहीं सकता

     मांझी ने कहा - हमें भी कोई नहीं हरा सकता

 

ऐसा राष्ट्र गौरव, छत्तीसगढ़ का गौरव संपूर्ण सम्पत्ति दानकर मर मिट गया। साहित्यकार परदेषी राम वर्मा ने मांझी पर लेख लिखा। कत्र्तव्य पर एक किताब भी लिखी है।

 

 

 

     गुण्डाधुर -

छत्तीसगढ़ राज्य के दक्षिण में स्थित बस्तर अंचल का ऐतिहासिक सांस्कृतिक महत्व है। वर्तमान में तीन जिलों में विभाजित यह अंचल ब्रिटिष भारत के सर्वाधिक बड़े राज्यों में गिना जाता था, छत्तीसगढ़ के 14 सामंतीय राज्यों में से बस्तर एक था। काकती राजवंष के शासक थे जो ब्रिटिष संप्रभुता के अंतर्गत शासन कर रहे थे। 1910 . में बस्तर में एक महासंघर्ष हुआ जिसकी गूंज सात समुद्र पर इंग्लैण्ड तक में सुनाई दी। 1910 तक भारत की सभी बड़ी शक्तियां अंग्रेजी दासता को स्वीकार कर चुकी थी।

 

1910 . के बस्तर विद्रोह का जननायक गुन्डाधुर नामक धुरवा जनजाति का आदिवासी था, उसने अपने साथियों के सहयोग एवं बस्तर राज परिवार के लाल कालिन्दर सिंह के आषीष से ऐसा संघर्ष किया कि दांतों तले उंगली दबानी पड़ती थी।

 

गुन्डाधुर तो कहीं का जमींदार था राज घराने का था। मांझी मुखिया भी नहीं था, वह समय के द्वारा प्रस्तुत महानायक था। लाल कालिन्दर सिंह का दाहिना था था। कुषल वक्ता, संगठन कर्ता, वीर योद्धा, नेतृत्व के गुणों से चक्र 6 फुट की ऊंचाई इसलिए मजबूत शरीर वाला तलवार, भाला, तीर धनुष से लैस योद्धा था। रक्त-क्रांति का अजय योद्धा। अनपढ़ मगर समझदार व्यक्ति ने चालाकी सूझ-बूझ से संघर्ष की रूप रेखा बनाई। 137 किमी लंबे और 100 किमी चैड़े भूभाग को उसने क्रांति की ज्वाला से देदीप्यमान किया, बस्तर के लोक गीतों में 1910 का संघर्ष स्थान प्राप्त कर चुका है -

 

     उन्नीस सौ दस बरख होली

बस्तर ने भुमक होली

मारा मारी, पूजा-ूपजी, ठाने ठाने गोली

कितरो साहेब मारे गेला

कितरा वायले पीला।

 

सारांश एवं निष्कर्षः-

डाॅ. रामकुमार बेहार लिखते हैं कि गुण्डाधुर को बस्तर आदिवासी अवतारी पुरूष मानने लगे हैं, गुण्डाधुर तो मारा जा सका और गिरफ्तार किया जा सका। अंग्रेजी गुप्तचर व्यवस्था पंगु सिद्ध हुई। गुन्डाधुर के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए 1910 में जन्में बालकों के नाम गुन्डा पर रखे गये।

 

विद्रोहियों को गुन्डाधुर ने सूझबूझ से संघर्ष की रूप रेखा समझाई। अपना रसद अपना हथियार लेकर आदिवासी संघर्ष के लिए निकलते। हर स्थान पर नायक नियुक्त किए गए थे। अंतागढ़ में आयतू महरा, कोंडागांव में भागी, दंतेवाड़ा में हिन्डा माड़िया, बीजापुर में रामनाथ, सुकमा में बोड़की, इन्द्रावती घाटी में रोदा पंदहा, जगदलपुर में सीताघर महरा, केषरपाल में जगदेव मरार, अगरवाड़ा में हरि चालकी, जैतगिरि में जयसिंग, बस्तर ग्राम जोगी, बारसूर-कोरिया मांझी, सूची देखने से स्पष्ट होता है जाति विषेष या वर्ग विषेष को दायित्व सौंपकर योग्य व्यक्ति को नायकत्व सौंपा गया।

 

ज्ञात, अल्पज्ञात और अज्ञात स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के विषय पर शोध पत्र लिख दिया ताकि सनद रहे वक्त पर आगे काम आवें। सन् 1973 में महाराष्ट्र में सत्य षोधन समाज की स्थापना की गई थी। तब से कहा जाता है -

     सर्व साक्षी जगत पती

त्याला को मंध्यस्थी।।

समाज षोधकों ने अंग्रेजों के विरूद्ध आवाज उठाई और सामाजिक न्याय की मांग की। अभी भी ज्ञात, अज्ञात, अल्पज्ञात, भूल बिसरे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी छत्तीसगढ़ में रह रहे हैं, उनकी पीढ़ी राह देख रही है, गुहार कर रही है कि कब उन्हें न्याय मिलेगा।

 

संदर्भ ग्रंथ सूची

1ण्     मार्डन इतिहास-कक्षा 12 वीं

2ण्     सामाजिक विज्ञान- कक्षा 8 वीं

3ण्     दुर्ग जिले का स्वतंत्रता संग्राम-श्रीराम घुप्पड़

4ण्     रविशंकर वि.वि. की स्मारिका- सन् 1970

5ण्     भूले बिसरे स्वतंत्रता सेनानी-ग्राम पेन्ड्री में विमोचित

6ण्     गुण्डाधुर- डाॅ. राम कुमार बेहार

7ण्     कंगला मांझी-डाॅ. परदेशी राम वर्मा

8ण्     गुरूर गौरव-डाॅ. प्रकाश पतंगीवार

 

 

 

 

Received on 08.08.2022         Modified on 14.11.2022

Accepted on 05.01.2023         © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences. 2022; 10(4):158-168.