महिला उद्यमी सफलता के नये सोपान
डाॅ. रूचि अग्रवाल
अतिथि व्याख्याता, शा.डी.के. कालेज बलौदाबाजार.
*Corresponding Author E-mail:
ABSTRACT:
भारतीय उद्योग जगत में सर्वोच्च स्तरों पर महिलाओं की उपस्थिति कितनी है, इस तथ्य से जुडे आँकडे आज भी उम्मीद से कम है। जिन स्थानो पर जो कुछ ही है, महिलायें शीर्ष पर नजर आती है वहाँ वह नीतिनिर्धारण मे भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। महिला सषक्तिकरण का प्रत्यक्ष संबंध उसके निर्णयन क्षमता से है अतः नीति वह निर्धारित कर सकता है जिसके पास निर्णयन क्षमता हो अर्थात सषक्त हो।
KEYWORDS: महिला उद्यमी, सफलता।
प्रस्तावना -
अध्ययन का उद्देष्य -
ऽ सफल महिला उद्यमियों की मुख्य विषेषताओं का विष्लेषण करना।
ऽ महिला उद्यमियों के पृष्ठभूमि का उनकी सफलता पर प्रभाव का अध्ययन करना।
ऽ शासन की योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करना ताकि अधिक संख्या मे महिला उद्यमी इसका लाभ उठा सकें।
आज का वर्तमान भारतीय समाज, समाज में परंपरागत रूप से लडकियों को उच्च षिक्षा लेने के लिये तो प्रेरित करता है लेकिन उन्हे एक उद्यमी के रूप में कार्य करने के लिए न तो प्रेरित किया जाता है और न ही सहयोग। उद्यमी बनना अर्थात कुछ नया करना या किसी स्थापित कार्य को नये तरीके से करना इसके लिये पुराने विचारो पर सवाल उठाने होते है, और अपने विचारो को सही सिद्ध करने के तर्क देने होते है जिसमें पर्याप्त रूप से जोखिम विद्यमान रहता है। वहीं महिलाओं से उम्मीद की जाती है कि ज्यादा प्रष्न न करे और परिवार मे सौहाद्र बनाकर रखें, यह समान स्थिति अधिक पढे लिखे और उच्चवर्गीय परिवारों मे भी होती है।
एक प्रष्नावली आधरित अध्ययन मे पाया गया कि महिला उद्यमियों को वित्त, कच्चे माल की कमी, तकनीकि दक्षता की कमी और षिक्षा एवं पारिवारिक समस्यायें सबसे अधिक परेषान करती है इसके लिये कुछ काम ऐसे भी होते है जो महिला उद्यमियों को प्राथमिक रूप से किये जाने चाहिये। जैसे-
महिलाओं को स्वयं को वित्तीय रूप से व्यवस्थित रखना -
एक अध्ययन मे पाया गया कि बहुत कम महिला उद्यमी वित्तीय संस्थाओं से मदद लेती है। इसके विपरित वह अपनी जमा पूंॅँजी पर आश्रित रहती है। नतीजा उनके व्यवसायों के संभावित स्तर पर इसका असर पडता है। मुख्यतः इसका कारण वित्त से जुडा अज्ञान भी है। इसके लिये आवष्यक है अपना वित्तीय ज्ञान बढाना। अमेरिका की भारतीय मूल की उद्यमी रोहिणी-डे का मानना है कि -
फायनेंषियल लिटरेसी मे प्रषिक्षण संभव है। यदि आप बैंकर्स और इन्वेस्टर्स की भाषा में बात करते है तो फंड मिलना आसान हो जाता है और जब आप सषक्त होते है तो ये लोग आपके लिये विनियोग करते है।
संघर्ष मे निरंतरता -
काकू नखते जो कि बैंक आॅफ अमेरिका मेरिल लिंच इंडिया की अध्यक्ष और कंट्र्ी हेड है के अनुसार 1990 के दषक मे जब वे मुंबई स्टाॅक एक्सचेंज आई थी तो वे वहाॅ मौजूद हजारों पुरूष ब्रोकर्स के बीच सात महिलाओं मे से एक महिला थी। लोगो को इस बात की चिंता थी कि स्टाॅक एक्सचेंज मे इतनी महिलायें तो नही होती परंतु अंततः उनके फसेले मे सबसे सहयोग दिया। अक्सर परिवारिक या समाजिक दबावों के चलते महिलायें उतनी सक्रियता से कैरियर या व्यवसाय की ओर नही मुड पाती, चूंकि उन्हे कई और काम भी करने होते है। आपको सोचना होगा कि यह आपका अपना ही काम है। आपको क्या खुष करता है - इस सवाल का जवाब सबसे पहले ढंूढना होगा।
सोषल मीडिया -
इंटरनेट ने व्यवसाय के नये अवसर खोले है, आज इंटरनेट पूरे सोषल मीडिया के कारण पूरा विष्व एक बाजार बन गया है। कई गृहणियों, विद्यार्थियों ने शौक और प्रयोग के तौर पर शुरूआत की थी, पर वे आज एक सफल उद्यमी के तौर पर पहचाने जाते है जैसे- निषा मधुलिका, कविता किचन आदि। सोषल मिडिया ने वर्तमान मे हर व्यवसाय को एक नया आयाम दिया है।
सामाजिक परंपरा, अषिक्षा और पुरूषो का अधिकारिक वर्चस्व जैसे कारण जो पहले थे अभी भी रूप बदलकर महिला उद्यमियों के समक्ष आते है। साथ ही जो महिलायें उद्यम क्षेत्र में कार्यरत है उन्हे पारिवारिक असयोग निपणन तथा वित्त संबंधी समस्याओं का सामना करना पडता है। महिलाओं मे उद्यमिता विकास एवं जागरूकता संबंधी विभिन्न शासकीय योजनायें छत्तीसगढ राज्य में संचालित होती है, लेकिन यदि उनके निष्पादन स्तर का अवलोकर करे तो ज्ञात होगा कि निर्धारित लक्ष्य और योजना क्रियान्वयन से लाभान्वित महिलाओं की संख्या में बहुत अंतर होता है। परिणामस्वरूप शासन द्वारा प्रदत्त कोष का सही व पूरा उपयोग नही हो पाता। महिला उद्यमियों के प्रमुख समस्याओं पर विचार करते हुये, उनके निराकरण के साथ जब योजनायें बनायी जायें तभी महिला उद्यमी के लिए सफलता के सोपान प्रषस्त होगें।
संदर्भित सूची:
1. मीणा मन्नालाल - सषक्तिकरण की मौन क्रांति
2. योजना - नई दिल्ली
3. प्रषासकीय प्रतिवेदन पत्रिका-महिला एवं बालविकास विभाग, रायपुर
Website –
1. www.msme.gov.raipur.in
2. www.cedmapindia.org.in
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Received on 23.09.2021 Modified on 19.10.2021 Accepted on 27.11.2021 © A&V Publication all right reserved Int. J. Ad. Social Sciences. 2021; 9(3):152-153.
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