जहाँगीर काल में ललित कलाओं की स्थिति

 

रघु यादव

शोध छात्र (इतिहास), वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर, (उ०प्र०)

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ABSTRACT:

जहाँगीर काल में चित्रकला के क्षेत्र में चित्रकला का प्रशिक्षण और उत्कृष्ट चित्रकारी को जन सामान्य तक पहुँचाने के उद्देश्य से चित्र शालायें स्थापित कीं। इस चित्रशाला की स्थापना से चित्रकला का विकास हुआ जहाँगीर के काल में कुछ ऐसे चित्रकार भी थे जो प्राक्रतिक चित्रण के चित्र बनाने में सिद्दहस्त थे। इस तरह से जहाँगीर काल में चित्रशाला के माध्यम से चित्रकारों के चित्रकलाओं को प्रोत्साहित किया गया एवं चित्रकलाओं का विकास किया गया।

 

KEYWORDS: जहाँगीर काल, ललित कला, चित्रशाला, चित्रकला प्राक्रतिक चित्रण सिद्दहस्त

 

 


 


प्रस्तावना -

अकबर का पुत्र सलीम का पूरा नाम नुरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर हुआ। अपने युवा काल में सलीम बहुत रसिक था। सन् 1611 ई० में योद्धा अलीकुली को मरवाकर उसकी विधवा नूरजहाँ से उसने निकाह कर लिया था। सलीम ने सत्ता पाने के लिए अपने पिता से वैचारिक संघर्ष किया तब वह सन् 1605 में बादशाह बन सका था। जहाँगीर का शासनकाल सन् 1605 ई० से सन् 1627 ई० तक रहा, जहाँ एक ओर जहाँगीर से न्याय पाने के लिए घंटा लगवाया गया था। वहीँ दूसरी ओर वह इतना क्रूर भी था की उसने षडयंत्र में लिप्त आने पुत्र खुसरो को कैद में डाल दिया था और बाद में उसे अँधा करा दिया था। इसके बाद भी उसे साहित्य की अपेक्षा ललित कलाओं में गहरी रूचि थी सत्ता में आने के पूर्व भी चित्रकला से उसे विशेष लगाव था जबकि उसके पिता अकबर को संगीत से बहुत प्रेम था।

 

अकबर 13 वर्ष की अवस्था में बादशाह हुआ था वह युवा अवस्था में ही ललित कलाओं के विकास के लिए तत्पर रहता था। उसके काल में चित्रकला को भी महत्त्व मिला। आइन अकबरी में उल्लेख है -

 

फलतः इस अद्भुत कार्य में समृद्धि प्राप्त की और चित्रकारों का एक वर्ग विख्यात हो गया। दरोगा और बितकची (मोहरिर्र) प्रति सप्ताह चित्रकारों के कामों को सम्राट के समक्ष लाते हैं।1

 

बाद में सलीम ने देखा तो उसने भी चित्रकला में गहरी रूचि ली। चित्रकला के क्षेत्र में युवाओं को चित्रकला का प्रशिक्षण और उत्कृष्ट चित्रकारी को जन सामान्य तक पहुँचाने के उद्देश्य से चित्र शालायें स्थापित कीं। इसके लिए उसने रिजा नामक चित्रकार को महत्व देते हुए आगरा में चित्रशाला स्थापित करके वहां का प्रभारी आकारिजा को बना दिया। इस चित्रशाला की स्थापना से चित्रकला का विकास हुआ इसके बाद इलाहाबाद में भी कई स्थानों से प्राप्त पाण्डुलिपियों के आधार पर चित्र बनाये गए। पहली पाण्डुलिपि चेस्टर वेट्टी लाइब्रेरी से प्राप्त सन् 1602 ई० की राजकुंवर की पाण्डुलिपि, दूसरी पाण्डुलिपि वाल्टर्स गैलरी, वाल्टर मोर संयुक्त राज्य अमेरिका से प्राप्त, आमिर नजमुद्दीन हसन देहलवीं का गजलों और रुवाइयों का संग्रह था। तीसरी पाण्डुलिपि ज्योतिष की थी जिसमें द्वादश भावों को रेखांकित किया गया था। इन पाण्डुलिपियों का चित्रांकन करने में अनन्त, अबुल हसन, बिसनदास, आकारिजा की कला मुखरित हुई। एक अनवार--सोहाइली की पाण्डुलिपि ब्रिटिश संग्रहालय में रखी हुई है। इसमें भी इन्हीं रचनाकारों द्वारा बनाये गए चित्र हैं। इस कृति का आरम्भ सलीम के बादशाह बनने के पूर्व आरम्भ हो चुका था किन्तु समापन सलीम के बादशाह बनने के बाद ही हुआ।

 

जहाँगीर के काल में कुछ ऐसे चित्रकार भी थे जो प्राक्रतिक चित्रण के चित्र बनाने में सिद्दहस्त थे। उनमें मंसूर नामक चित्रकार का नाम अग्रगण्य हैं। जहाँगीर ने चित्रकारों से ऐसे दृश्य भी बनवाये जिनका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं था। जिस प्रकार राजकवियों, चारणों, हरबोलों ने अपने आश्रय दाता शासक की प्रशंसा करने में अतिशयोक्ति की पराकाष्ठा कर दी है, उसी प्रकार चित्रकारों ने भी अपने आश्रय दाता शासक की क्षमता, युद्ध कौशल और वर्चस्व को प्रदर्शित करते हुए चित्र बनाकर भावी पीढ़ी को सम्यक इतिहास से दूर करने का प्रयास किया है क्योंकि ऐसे चित्रों कि पुष्टि सर्वनिष्ठ इतिहास नहीं करता है। जहाँगीर के जीवन विषयक ऐसे चित्र वाशिंगटन, डबलिन के संग्रहालयों में रखे हैं। उनमें से एक चित्र का उल्लेख ध्यातव्य है -

 

डबलिन में उपलब्ध कुछ चित्रों में उसे ईरान के शाह अब्बास का स्वागत करते हुए और उसे गले लगाते हुए दिखाया है जबकि यथार्थ में वह उससे कभी मिला ही नहीं था।2

 

इस चित्र के अतिरिक्त भी एक चित्र में काल्पनिक सभा का दृश्य है जिसमें जहाँगीर को दूरस्थ देशों के शासकों की उपस्थिति में सदारत (अध्यक्षता) करते हुए दिखाया गया है। जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा में शाह अब्बास के पत्र का उल्लेख किया है जिसमें शाह अब्बास ने बहुत दूर होने के कारण जहाँगीर से भेंट करने में असमर्थता व्यक्त की है -

अति दूरी के कारण मैं अपनी इच्छा पूरी नहीं कर सकता फिर भी वह मेरी अभिलाषा का किबला है, भगवन को धन्यवाद है कि हम दोनों एक हैं। दोनों बड़ी दूरी पर हैं परन्तु हमारी आत्माएं पास - पास हैं।3

 

आशय यह है की लिखित से अधिक चित्र विश्वसनीय  लगता है। चित्र में असत्य चित्रण करने के मूल में बादशाह की मिथ्या लोकेषणा की आकांक्षा हो सकती है या बादशाह की विशेष कृपा का आकांक्षी चित्रकार हो सकता है। सामान्यतः दरबार के चित्रों में बेगमें भी ऊँचाई पर बैठी दरबार की कार्यवाही देखते हुए चित्रित की जाती थीं। उनके सामने एक झीना पर्दा भी किसी-किसी चित्र में दिखाया जाता है, उस समय उनके चेहरे पर पर्दा नही हुआ करता था किसी भी दरबारी को ऊपर देखना वर्जित था कितु नूरजहाँ ने अभी भी पर्दा नहीं किया है। विशेष रूप से जहाँगीर से निकाह होने के बाद दरबार की कार्यवाहियों और निर्णयों में नूरजहाँ का हस्तक्षेप रहता था। वैनी प्रसाद जी ने भ्पेजवतल िश्रंींदहपत में उल्लेख किया है -

नूरजहाँ उसका उल्लंघन थी वह पर्दा नहीं करती थी और जनता के सामने आती थी।4

 

अतः जहाँगीर के व्यसन करने की पराकाष्ठा पर पहुँचने पर नूरजहाँ ने बादशाहत पर पूरा अधिकार कर लिया था और धीरे - धीरे जहाँगीर के व्यसन में कमी करती गई थी।

 

यद्यपि जहाँगीर संगीत कार्यक्रम कराता था और संगीतकारों का सम्मान करता था किन्तु जब वह नशे में होता था तो उसके क्रियाकलापों में विरोधाशास हो जाता था।

 

 

 

एक बार दरबार में संगीतकार पहुँचा तो उसे देखकर जहाँगीर क्रोधित हो गया। नूरजहाँ की जीवनी में इस प्रसंग का उल्लेख किया गया है -

उस समय जहाँगीर पर नशे के कारण सनक सवार हो गई। वह झट आवेश में गया    और बोला - ”धनुष - बाण लाओ। मैं इसे जान से मारूंगा।”5

 

फिर नूरजहाँ ने त्वरित बुद्धि का परिचय देते हुए चोट करने वाले बाण और धनुष जहाँगीर को दे दिया उसने संगीतकार के कान में कहलवा दिया की बाण लगते ही चिलाते हुए लेट जाना तब ऐसा होने पर ही जहाँगीर का क्रोध शांत हुआ और संगीतकार के प्राण बच सके।

 

संगीतकारों ने अपने गाये रागों में बादशाहों के गुणों वैभव का भी उल्लेख करते थे। दरबार में भारत के ही नहीं अपितु मशहद, हेरात आदि देशों के भी संगीतकार अपनी कला का प्रदर्शन करते थे। अकबर के काल में मियां की तोड़ी, मियां की मल्हार, दरबारी कान्हरा, मियाँ की सारंग इत्यादि रागों की रचना की। तानसेन के छोटे पुत्र विलास खान सहित अन्य संगीतकार मक्खू हमजान, खुर्रमदाद इत्यादि संगीतकार थे। गजल गायक शौकी को दरबार में विशेष सम्मान प्राप्त था। ध्रुपद गायकी  पर ख्याल गायकी प्रभावी होती जा रही थी। चित्रकार राग रागनी के लक्षण के अनुसार उनका चित्र बनाते थे। जहाँगीर चित्रकला की पहचान में निष्णात था। वह चित्र देखकर ही चित्रकार का नाम बता देता था। यदि एक ही स्थान पर कई चित्रकारों ने चित्र बनायें हैं तो भी वह चित्रकार को चिन्हित कर देता था उसकी सूक्ष्म परक इतनी गहरी थी कि एक ही चित्र में ओठ किसी ने और भौंह किसी ने बनाई तो भी वह समझ जाता था। जहाँगीर को शिकार की कला में भी कुशलता प्राप्त थी उसकी शिकार यात्रा को प्रदर्शित करते हुए भी चित्र मिले हैं। जहाँगीर के काल में मुगल कला चरम सीमा पर थी। सी. शिवराम मूर्ति लिखते हैं -

 

Jahangir, who had an intelligent wife Manage state craft was left with sufficient leisure to enjoy wine and appreciate art probably this was the greatest period of the renaissance of Mughal Art.6

 

मूर्ति जी ने पत्नी का उल्लेख करते हुए नूरजहाँ की ओर संकेत किया है। यद्यपि उसकी पहली पत्नी मानवती थी जिसके पुत्र खुसरो को पिता के विरुद्ध उसकी हत्या के षड्यंत्र में दण्डित किया गया था। जहाँगीर काल में मनसबदारी या पुरुस्कृत करते हुए जड़ाऊ खंजर देने की परंपरा थी खंजर में नक्काशी की जाती थी जहाँगीर के मित्र ओरछा के राजा वीर सिंह देव प्रथम (सन्, 1605-1627 ई०) थे। जहाँगीर उनके आमंत्रण पर ओरछा आये थे जहाँगीर के ठहरने के लिए दतिया में बीस लाख लागत का सात खण्डीय महल बनवाया गया था।

 

फिर ओरछा ने उनके ठहरने के लिए महल बनवाया गया जो जहाँगीर महल नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसी महल में जहाँगीर ठहरा था, जबकि दतिया का महल बनवाने वाले वीर सिंह देव स्वयं रहे और ही जहाँगीर ठहरा आज भी वह महल खाली पड़ा हुआ है।

 

इस प्रकार जहाँगीर का जीवन सल्तनत और ललित कला के प्रति रूचि पूर्ण रहा। व्यसनीय होने के कारण उसका कुछ कालखंड ऋणात्मक प्रभाव का कहा जा सकता है, उसने अपना अन्त समय कैद में काटा  दीवान प्रतिपाल सिंह लिखते हैं।

 

नूरजहाँ के षड्यंत्र से खुर्रम और महावत खां विद्रोही हो गये थे। खुर्रम परास्त होकर सन् 1625 ई० में शांत हुआ था। और महावत खां ने सन् 1625-27 ई० में बादशाह को एक साल कैद में रखा था।7

 

जहाँगीर ने वाराणसी में संत तुलसीदास जी का चित्र बनवाया था। पैर मोड़कर बैठे संत तुलसीदास श्री रामचरितमानस रखे हैं। वही चित्र श्री रामचरितमानस के आरंभिक पृष्ठ पर दिखाई देता है। जहाँगीर ने चमत्कार दिखाने की स्थिति में तुलसीदास जी को काराग्रह में डाल दिया गया था बाद में चमत्कार द्वारा ही एक अन्य व्यक्ति का सहयोग करने पर करागृह से मुक्त कर दिए गये थे।

जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा में वंशानुगत चित्रकारों अन्य चित्रकारों का भी वर्णन किया है किन्तु मनोहर नामक चित्रकार का उल्लेख नहीं किया है, अस्तु भारत सरकार को चाहिए की विदेशों में रखे जहाँगीर कालीन चित्रों को मंगाये ताकि भारतीय चित्रकारों का मनोबल बढ़े और वर्तमान कला साधक प्रेरणा ले सकें।

 

संदर्भ संकेत -

1.     आइन--अकबरी-अनुवादक-रामलाल पाण्डेय -पृष्ठ संख्या -240

2.     मध्यकालीन भारत भाग-2 (सन् 1540-1761)-हरीशचन्द्र वर्मा-पृष्ठ संख्या-518

3.     तुजुक--जहाँगीरी-अनुवादक डॉ० मथुरा लाल शर्मा-पृष्ठ संख्या-108

4.     उत्तर प्रदेश रू सोलहवीं शताब्दी-डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद सिंह-पृष्ठ संख्या-266

5.     मुगल सल्तनत रानी नूरजहाँ - लुबना मरियम - पृष्ठ संख्या - 66 Indian Painting . C Sivarama Murti. Page-90

6.     बुन्देलखण्ड का इतिहास - दीवान प्रतिपाल सिंह भाग -6 -पृष्ठ संख्या - 104  

 

 

Received on 25.05.2021          Modified on 10.06.2021

Accepted on 21.06.2021 © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences. 2021; 9(2):123-126.

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