आदिवासी  साहित्य एवं संस्कृति जिला-जांजगीर चाम्पा के संबंध में

 

Dr. (Smt.) Vrinda Sengupta1, Dr. K.P. Kurrey1

 

1Asstt. Professor (Sociology), Govt T.C.L..P.G.College Janjgir

 

 

आदिवासी जीवन प्रकृति के साथ अभिन्न रुप से जुड़ा है। वनों पर उनके पारंपरिक अधिकारों पर आघात के बाद ही वनों का क्षरण शुरु हुआ है। पुस्तक में प्रकृति और आदिवासियों के परस्पर संबंधों पर एक आलेख पर्यावरण और आदिवासी लोक जीवनमें इस पर विस्तार से चर्चा की गई है। इसमें बतलाया गया है कि आदिवासियों का संपूर्ण जीवन ही प्रकृति पर आधारित है। वे प्राकृतिक शक्तियों को ही देवता मानकर उनकी अराधना करते रहे है। प्रदूषण की समस्या दरअसल अनियोजित  औद्योगिकीकरण के कारण उत्पन्न हुई। अभी दूरस्थ इलाकों में जहां आदिवासी रहते हैं पर्यावरण काफी हद तक सुरक्षित है।

 

संस्कृति साहित्य  प्रकृति भौगोलिक स्थिति।

 

 

प्रस्तावनाः

निश्चय ही साहित्य और सांस्कृतिक दृष्टि से आदिवासी समाज से गैर आदिवासी समाज लगभग अपरिचित ही रहा है। संस्कृति समृद्ध आदिवासी लोकजीवन को गहराई से जानने समझने के लिए अधिक प्रयास नहीं किए गये। इसके अलावा भारत जैसे विशाल देश में अन्य हाशिये के समाज की तरह आदिवासी समाज भी भौगोलिक स्थितियों के चलते इतिहास के जंगलों में लगभग आत्मनिर्वासित रहा है। आदिवासियों ने अपने सहज, सरल, नैसर्गिक जीवन के विराट संसार में अपनी अलग से कोई विशष जगह बनाने की कोशिश नहीं की है। ऐसे में बदलते हुए बौद्धिक पर्यावरण के बीच जन सामान्य या जिज्ञासुओं को आदिवासी संस्कृति और साहित्य से परिचित कराने के प्रयास में विभिन्न विद्धानों द्वारा लोक जीवन के विचारों का यह गुलदस्ता हमने पुस्तक के रुप में तैयार किया है।

 

संस्कृति, दृष्टि से ही नहीं साहित्य दृष्टि से भी आदिवासी समाल हासिये पर रहा है। इसका कारण शायद लिपि का अभाव रहा है। जबकि निर्मल कुमार बोस की तरह मेरा भी मानना हैं कि औद्योगिकीकरण सभ्यताओं को समझना आसान है। उनकी तुलना में उसके पूर्व की सभ्यता को समझना अत्यंत कठिन है। इसे समझना आराम कुर्सी पर बैठे-बैठे सोच में लगे विद्धानों के बस की बात नहीं है। यह उसका काम है जो स्वतंत्र चिंतन के साथ-साथ फील्ड वर्क में अधिक परिश्रम और धरातलीय लोगों के जीवन में निरंतर निरीक्षण को अपने सम्पूर्ण जीवन के लक्ष्य के रुप में स्वीकार करने के लिए तैयार है।

 

महत्व:

हमारे आदिवासी समाज के पास लोक साहित्य का अनमोल खजाना सुरक्षित है। जिसे उन्होंने पीढ़ी-दर-पीढ़ी वाचिक परंपरा में जीवित रखा है। इसी समृद्ध विरासत को हमने प्रस्तुत संकलन के माध्यम से आप तक पहुॅचाने का प्रयास किया है।

 

पिछले  कुछ वर्षो से आदिवासी समाल में शिक्षा के प्रकाश से वे नयी-नयी विचारधाराओं और परिवर्तनगामी सोच से परिचित हो रहा है। यही बोध उनके साहित्य में झलक रहा है। वाहरु सोनवणे जैसे अनेक अहिन्दी भाषी लेखक अपनी कलम से इसे व्यक्त करने में लगे हैं। साहित्य लोक कथा, लोक-कला आदि से ही लोक -संस्कृति का निर्माण होता है। लोक साहित्य में लोक मानस ही मुखरित होता है। लोक साहित्य का एक महत्वपूर्ण अंग है - लोक-गीत। जिनके माधुर्य से पुरुषों नें अपनी थकान नष्ट की है तथा बूढ़ों ने अपने आप को जवान महसूस किया है। युवाओं ने अपनी प्रेम रुपी कोमल भावनाओं को अभिव्यक्त किया है और किसानों ने हल जोते है।

 

उद्देश्यः-

1 अपने ही देश में अजनबी होने का दंश- उसे पहचान दिलाने की कोशिश।

2 आदिवासी साहित्य और संस्कृति को जीवंत रखना।

3 आदिवासी अपने सम्मान और अस्मिता की रक्षा कर सके।

 

परिकल्पनाः-

1 आदिवासियों की मूल प्रवृत्ति को उनसे अलग करना।

2 आदिवासियों की सभ्यता संस्कृति को आघत पहुॅचाना असंभव है।

 

शोध प्रविधि

प्रस्तुत शोध पत्र को तैयार करने में द्धैतीयक आंकड़ों का संग्रहण किया गया है। एवं अपने विचार तथा साहित्य मंथन के बाद प्राप्त निष्कर्षों को आधार बनाया गया है।

 

मुख्यधारा की समस्या

कुछ लोग आदिवासियों को मुख्यधारामें लाने की दिशा में प्रयत्नशील है। कहा जा रहा है कि यह बहुत अच्छा कार्य किया जा रहा है किन्तु आदिवासियों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास एक तरह से आदिवासी संस्कृति पर किया गया हमला ही है तथा उनकी संस्कृति का यह विकृतिकरण ही किया जा रहा है।

 

इस प्रयास में श्रम प्रतिष्ठा , सह - समूह जीवन तथा परस्पर सहयोग पर खड़ी आदिवासी संस्कृति का हनन होना निश्चित है।

 

निष्कर्ष

आदिवासी संस्कृति यह धर्म पूर्ण संस्कृति है।  जिसमें मानवीय मूल्यों की निधि जतन करने वाली मुख्यधारा का निर्माण हमें मिलकर निश्चित करना होगा। जिससे मानव जीवन में होने वाले शोषण की परंपरा को खत्म करना होगा। श्रम, समूह तथा सहयोग आदि से युक्त मूल्यों का जतन करने वाली, अन्याय, अत्याचार तथा युद्ध की लालसा वृŸिा को नष्ट करने वाली, मानव जीवन में सुख, शांति प्रस्थापित करने वाली ऐसी मुख्यधारा का निर्माण होना अपेक्षित है।

 

संदर्भ सूची

शर्मा, विसाला, कोल्हारे, Ÿाा, आदिवासी साहित्य एवं संस्कृति, स्वराज प्रकाशन नई दिल्ली, पृ.क्र. 10,11 ,

सोनवने, वाहरु, आदिवासी साहित्यः संस्कृति तथा अस्मिता, आदिवासी साहित्य एवं संस्कृति पृ. क्र 58 ,

गुप्ता, रमणिका, आदिवासी चेतना, साहित्य और संस्कृति का मूल्यांकन आदिवासी साहित्य एवं संस्कृति, पृ. क्र. 21

 

 

 

Received on 20.06.2017       Modified on 25.07.2017

Accepted on 19.08.2017      © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences. 2017; 5(4):197-198.