संत आंडाल की सामाजिक चेतना

 

डॉ0 सुधीर कुमार राय

एस¨शिएट प्र¨फेसर, समाजशास्त्र्ा-विभाग, उदय प्रताप स्वायत्तशासी महाविद्यालय, वाराणसी।

 

संत आंडाल पूर्वमध्यकाल की प्रसिद्धआलवारसंत थीं। दक्षिण भारत में वैष्णव भक्ति ¨ ¨कप्रिय बनाने मेंआलवारसंत¨ का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ¨गदान था।आलवारका अर्थ ¨ता है- ‘अध्यात्मरूपी समुद्र में गहरा ¨ता लगाने वाला व्यक्ति।’1 ये सन्त भगवान् नारायण के सच्चे प्रेमी उपासक थ्¨ इनके उपदेश¨ की भाषा तमिल थी, जिसमें सरस गीत¨ की रचना कर इन्ह¨ंनेभक्तिके माध्यम से एक जनचेतना का विकास किया। आलवार¨ ने अपने जीवन से इस सत्य की ¨षणा की कि भगवान् के दरबार में प्रवेश पाने का अधिकार सभी ¨ है। ब्राह्मण, शूद्र, पुरुष स्त्र्ाी सभी बिना किसी भेद के इस व्यवस्था के अंग हैं।2 ये आलवार सन्त जिनकी संख्या 12 थी, समाज के विविध वगर्¨ से सम्बद्ध थ्¨- नामालवार वल्लाल जाति का था, तिरूमंगइ कल्ल (लुटेरा) परिवार का था, कुलश्¨खर राजा, पेरियावलार ब्राह्मण एवं आंडाल स्त्र्ाी थी।3

 

श्री नाथमुनि ने इन सभी आलवार¨ की रचनाअ¨ (प्रबन्धन) का एक संग्रह तैयार किया, जिसका नामनालायिर प्रबन्धकम्है, ¨ परमपवित्र्ा माने जाते हैं तथा वैष्णव वेद कहलाते हैं।4 यह संग्रह आलवार¨ के अध्ययन के लिए प्रमुख स्र¨ हैं। दक्षिण भारत के धार्मिक जीवन में आज भी यह संत सामाजिक चेतना ¨ जागृत करने वाल्¨ मानवतावादी सुधारवादिय¨ के रूप में स्मरण किये जाते तथा वैष्णव मंदिर¨ में इनकी मूर्तियाँ भी स्थापित है। इन्हीं आलवार संत¨ में एकमात्र्ा स्त्र्ाी संत आंडाल थी, जिसकी रचनाएँ केवल कृष्ण के प्रेम की साक्षी है, बल्कि व्यापक समाज चिन्तन के भी उदाहरण हैं। प्रस्तुत ¨धपत्र्ा का उद्देश्य आंडाल के काव्य में उपलब्ध सामाजिक चेतना का विश्ल्¨षण करना है।

 

आंडाल ¨ समझने से पूर्व उसके युग ¨ समझना आवश्यक है। बारह आलवार सन्त¨ की तिथि ¨ ल्¨कर मतभेद है। ऐतिहासिक¨ ने इन्हें इतिहास के एक विशाल कालखण्ड में रखा है ¨ सामान्यतया ©थी-पांचवीं शताब्दी ईसवी से बारहवीं शताब्दी ईसवी तक रखा जाता है।5 के0आर0 श्रीनिवास आयंगर इस तिथि ¨ सन् 500-850 ईसवी के मध्य रखने के पक्षधर हैं।6 यह समय दक्षिण भारत में महत्त्वपूर्ण राजनीतिक सत्ताअ¨ का युग था, जिनमें से कुछ के सम्पर्क ¨ उत्तर भारत के साथ भी हुए। ¨¨ का महान साम्राज्य स्थापित ¨ रहा था © समकालीन राजनीतिक-सत्ताएँ उनके साम्राज्यवाद के अधीन थी। सामन्तवाद पूर्ण विकास पर था। आर्थिक असमानता, धार्मिक प्रतिस्पर्धा के उदाहरण भी सुगमता से उपलब्ध थ्¨ उत्तर भारत में ब्राह्मण धर्म का पुनरुत्थान ¨ रहा था, अतः ©द्ध¨ एवं जैन¨ ने अपनी आश्रयस्थली के रूप में इस क्ष्¨त्र्ा का चुनाव काफी पूर्व ही कर लिया था। यद्यपि ब्राह्मणीय परम्परा के प्रसार की आंधी इस प्रदेश तक भी पहुँच चुकी थी। ©राणिक देवताअ¨ की उपासना ¨कप्रिय थी। ©राणिक¨ एवं ©द्ध¨-जैन¨ के कटु सम्बन्ध के उदाहरण भी मिलते हैं। मुख्यतः जैन¨ का प्रभाव राजदरबार¨ तक पहुँच चुका था। ऐसे परिवेश में वहाँ भक्ति-आंद¨लन का सूत्र्ापात ¨ता है। वैदिक-©राणिक परम्परा ¨ श्© सन्त नायन्मार एवं वैष्णव संत आलवार अपनेभक्तिकी सरलता एवं रहस्य के आवरण में जनता के बीच प्रस्तुत करते हैं। जिनमें सरल, सहज भक्ति के साथ चमत्कार का अंश भी सम्मिलित ¨ता है, ¨ सामान्य जन ¨ बरबस ही अपनी ¨ आकृष्ट करता है। फलतः शुष्क दार्शनिक चिन्तन वाल्¨ धर्म इनके समक्ष ©ने ¨ जाते हैं। आलवार¨ ने अपनी भक्ति के लिए शरणागत, वात्सल्य एवं माधुर्य तीन¨ भाव¨ ¨ साधन बनाया जिनमें नम्म आलवार एवं आंडाल ने मुख्यतः माधुर्य ¨ अपनाया जिनका प्रभाव © भी व्यापक हुआ। रामानुजाचार्य ने आलवार¨ के प्रबन्धम् का गंभीर अध्ययन किया। अतः यह कहना अनुचित ¨गा कि उनका दार्शनिक चिन्तन ¨काश्रित आलवार चिन्तन से निश्चय ही प्रभावित था।

 

इस पृष्ठभूमि के संत आंडाल की मीमांसा अधिक व्यवस्थित ¨ पायेगी। बारह आलवार¨ की ज्ञात सूची में आंडाल का नाम ©वें स्थान पर आता है। इनके उत्पत्ति की कथा भी अत्यन्त ¨चक है। कथा मिलती है कि आठवें आलवार पेरि अथवा विष्णुचित्त ¨ अपने बगीचे में जमीन ¨दते समय एक पेड़ के नीचे शिशु आंडाल मिली। वह उसे घर उठा ल्¨ गया © एक पिता के समान उसे पाला ¨सा। प्रारंभ में उसका नाम उन्ह¨ंने¨दईरखा जिसका अर्थ ¨ता हैफूल¨ के हार के समान कमनीय7 ‘आंडालनाम ¨ उसे संत रूप में ख्याति मिलने के बाद मिला जिसका अर्थ ¨ता है- ‘शासिका’8 © इसे संस्कृत में¨दाकहा गया।9 भगवान् रंगनाथ की परिणीता के कारण इसेरंगनायकीभी कहा गया। आंडाल का परिवेश पूर्णतया भक्ति परम्परा का था। पिता के भक्ति गीत¨ ने मदुरा के राजा ¨ भी अत्यन्त प्रभावित किया था, फलतः उन्ह¨ंने राजा ¨ भक्ति के रहस्य¨ की शिक्षा दी थी।10 पुत्र्ाी आंडाल पिता की भक्ति, उनकी पूजा में सहायता करती एवं पिता के गीत¨ से ज्ञान प्राप्त करती थी। धीरे-धीरे यहभक्तिउसके भी जीवन का अंग बन गई। वह भगवान् ¨ सदैव अपना प्रियतम मानती थी, ठीक ¨पिय¨ की भाँति। भावावेश में आकर वह कभी-कभी रंगनाथ के निमित्त तैयार की गई माला ¨ स्वयं पहनकर दर्पण में अपनी छवि इस आशय से देखती कि उसका ©न्दर्य भगवान् ¨ पसन्द आयेगा या नहीं? कहा जाता है यह देखकर विष्णुचित्त यह समझते हैं कि पुत्र्ाी ने अज्ञानवश भगवान् की माला ¨ अपवित्र्ा कर दिया अतः वह माला भगवान् ¨ग्य नहीं है ल्¨किन भगवान् ¨ भाव के प्रेमी ¨ते हैं, अतः वह विष्णुचित्त से स्वयं उस माला ¨ अर्पित करने का आग्रह किया।11 तब से पिता अपनी पुत्र्ाी ¨ कृष्ण ¨ अनुशासित करने वाली, प्रेमपाश में बांधने वाली शासिकाआंडालकहने लगे। वह कृष्ण के प्रेम में सदैव व्याकुल बनी रहती थी। अनुश्रुतिय¨ के अनुसार एक दिन श्री रंगनाथ जी ने मंदिर के अधिकारिय¨ ¨ आदेश दिया किआंडालके साथ मेरा विवाह कराअ¨ अधिकारिय¨ ने विविध उत्सव¨ के साथ ऐसा ही किया। ज्य¨ ही आंडाल मंदिर में गई, त्य¨ ही वह भगवान् की श्¨षशय्या पर चढ़ गई।12 कहा जाता है कि उस समय सर्वत्र्ा एक दिव्य प्रभा फूटी, जिसमें आंडाल विलीन ¨ गयी। भगवान् © उसका द्वैत सदैव के लिए समाप्त ¨ गया।

 

आंडाल के ¨ काव्यग्रन्थ¨ (1) ‘तिरुप्पावै© (2) ‘नाच्चियार तिर¨¨लीप्रसिद्ध है। पहला ग्रन्थतिरुप्पावैतमिल भाषिय¨ का प्रिय ग्रन्थ है। इसेतिरुप्पावै श्रीब्रह्मभी कहा जाता है, तमिल क्ष्¨त्र्ा में इसकी अत्यन्त ¨कप्रियता है इसमें तीस पद्यपावै व्रत’ (कात्यायनी) से सम्बन्धित है। यह कृति उनके रहस्यवादी चिन्तन को भी उभारती है तथा प्रेम की गत्यात्मक ऊर्जा ¨ प्रदर्शित करता है। यह एक गीति-निबन्ध © अद्भुत संगीत सम्पन्न है। तमिल के वैष्णव भक्त¨, विश्¨षतः स्त्र्ािय¨ के लिए ¨ यह एक अमूल्य निधि है। ग्रन्थ में रहस्यात्मक भक्ति का चिन्तन अत्यन्त मार्मिक है- ‘‘आंडाल © उसकी सखियाँ © फटते ही आकाश से बरसे ताजे पानी से नहाती है © जुलूस बनाकर श्रीकृष्ण के घर जाती है; घनी कल्पना से वे फिर एक बार वे ही व्रज की ¨पियाँ बन जाती है, ¨ कृष्ण के हाथ¨ अल©किक प्रेम का अमृत पीने के लिए आतुर रहती थी। गीत के लय का इस जुलूस के लय से © इस कथावस्तु से पूरा सामंजस्य है © यह ©न्दर्यमयी लय भक्त हृदय ¨ आन्द¨लित कर देती है। आंडाल की रचनाएँ कृष्ण-भक्ति के माध्यम से जनसमस्याअ¨ के निश्चित निदान ¨ कुछ इस प्रकार अभिव्यक्त करती है-

 

दाम¨दरन्, जिसमें अपनी माँ का गर्भ किया

आल¨कित-अतीत © भविष्य के दुष्ट संदर्भ

सब मिट गये तब, जैसे रूई आग की

लपट¨ में भस्म हुई राख बन जाती है।’13

 

© फिर अपनी आस्था © भक्ति की नित्यता एवं चिरजीविता ¨ व्यक्त करते हुए लिखती है-

 

       केवल आज भर के लिए नहीं

       हम तेरे दास बन आये हैं; बल्कि ¨ ¨विन्द,

       सदा-सदा के लिए, सात जन्म¨ के लिए। केवल

       तेरी ही सेवा करेंगे हम; हमसे निकाल ¨ प्रभु

       दूसरी सभी स्नेह प्रेम।14

 

अद्भुत व्यापकता है आण्डाल की भक्ति में। समस्त ©तिक जगत के मिथ्यात्त्व की पीड़ा का अनुभव करने वाला मन ही समस्त त्याग की कल्पना कर सकता है। निश्चय ही आण्डाल उसी सशक्त भाव का निवेदन करती हुई दिखाई दे रही है। इतना ही नहीं आण्डाल अपनी रचनाअ¨ में देशप्रेम की भावना, ¨कसंग्रही चेतना, धार्मिकता एवं नैतिक आचरण की अनुकरणीयता का भी ¨ कराती है। अपनी एक रचना में वह कहती है कि- ‘‘यदि हम त्र्ािविक्रम विष्णु के नाम पर कीर्तन करते हुए व्रतादि के लिए स्नानादि करके सद् आचरण करेंगी ¨ समस्त देश कष्ट रहित ¨ जायेगा। महीने में तीन बार वर्षा ¨गी। देश लहलहाते ख्¨¨ से सुन्दर बनेगा, सर¨वर¨ में कमल-फूल सुश¨भित ¨ंगे, रंग बिरंगी मछलियाँ ¨ंगी तथा देश अक्षय धन-धान्य से परिपूर्ण ¨गा। गाय¨ के नीचे दूध भरपूर ¨गा, ग्वाल्¨ दिन-रात ¨हन में व्यस्त ¨ंगे, उनकी गागर दूध से भरी रहेंगी।’’15 इससे ऐसा लगता है किभक्तिके साथ-साथ वह अपने समाज, उसकी समस्याअ¨, कष्ट¨ आदि के प्रति भी जागरूक थी। उनका यही पक्ष उसे अन्य भक्त¨ से विशिष्ट बना देती है। ¨ से ल्¨कर शास्त्र्ा तक का ज्ञान सहसा ही उनकी रचना में समाविष्ट दिखाई देता है। समस्त समष्टि के कष्ट ¨ दूर करने की प्रार्थना उसकी कविताअ¨ ¨ व्यापक आयाम प्रदान करती है। कष्ट भी किसका किसान का, पशु पालक का। यह निश्चय ही आंडाल की सामाजिक संवेदनशीलता से निकल्¨ बिम्ब है। उसे विश्वास था कि नैतिक उत्थान समाज के विकास का कारण ¨ता है। आंडाल केवल स्वतः ही भक्ति से ¨क्ष या मुक्ति नहीं चाहती बल्कि अपनी सखिय¨ अर्थात् समस्त नारी समाज ¨ अपने साथ ¨ड़ने का प्रयास करती है। उसकी यही ¨कचेतना उसे उसके समाज में ¨कप्रिय बनाता है © ¨कप्रियता इतनी कि वह अपने इष्ट के समान ही पूजनीय बन जाती है।

 

तिरुपावै की तरहनाच्चियारु तिरुम¨लिभी उसकी महत्त्वपूर्ण रचना है। जिसमें उसके स्वप्नद्रष्ट विवाह का विवरण प्राप्त ¨ता है। आंडाल की रचनाअ¨ में वैदिक एवं ©पनिषदिक चिन्तन पर आधारित रहस्यमयी तत्त्व¨ ¨ देखकर बाद में विशिष्टाद्वैत मत के प्रतिष्ठापक श्री रामानुजाचार्य आंडाल के गीत¨ से भाव विभ¨ ¨ जाते थ्¨ श्री वेदान्तदेशिकाचार्य ने आण्डाल के गीत¨ ¨ आधार बनाकर¨दास्तुतिनामक ग्रन्थ लिखा। राजा श्रीकृष्णदेव राय ने भी आंडाल के जीवन एवं भक्ति ¨ विषय बनाकर तेलुगु भाषा मेंआमुक्तमाल्यदामहाकाव्य लिखा।

 

तमिल क्ष्¨त्र्ा के जनजीवन में आंडाल आज भी अत्यन्त ¨कप्रिय है। उसकी स्मृति में आज भी मार्गशीर्ष में अविवाहित कन्याएँ ¨ग्य वर की प्राप्ति के व्रत करती हैं। उसके द्वारा रचित नाच्चियारु तिरुम¨लि के पद विवाह आदि के अवसर¨ पर गाया जाता है। इतना ही नहीं आंडाल की मूर्ति वहाँ के प्रत्येक महत्त्वपूर्ण विष्णु मंदिर में स्थापित है। आंडाल की रहस्यमयी भक्ति, कृष्णप्रेम, ¨ककल्याण, रहस्यवाद का स्पष्ट प्रभाव सदिय¨ बाद हुई सन्त मीरां की रचनाअ¨ में देखा जा सकता है, ¨ निश्चय ही आंडाल के व्यापक सामाजिक प्रभाव का परिणाम है।

 

संदर्भ:

1.     उपाध्याय, आचार्य बलदेव, वैष्णव सम्प्रदाय¨ का इतिहास एवं सिद्धान्त, प्रथम संस्करण, 1978, पुनः मुदित, 2011, पृ0 146

2.     वही, पृ0 147

3.     मजुमदार, आर0सी0 एवं 0डी0 पुसलकर, श्रेण्य युग, हिन्दी अनुवाद, शिवदान सिंह ©हान, दिल्ली, 1984, पृ0 377

4.     भण्डारकर, आर0जी0, वैष्णव, श्© एवं अन्य धर्म, पृ0 74; चतुर्वेदी परशुराम, उत्तरी भारत की संत परम्परा, इलाहाबाद, 2010, पृ0 65-66

5.     भण्डारकर, आर0जी0, पृ0 73, यहाँ सभी आलवार सन्त¨ के तमिल एवं संस्कृत नाम तथा परम्परात तिथियाँ उल्लिखित है। जिसमें प्रथम संत की तिथि 4203 0पू0 एवं अन्तिम की 2707 0पू0 है। किन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से ये तिथियाँ पूर्णतया अविश्वसनीय है।

6.     मजुमदार, आर0सी0 एवं 0डी0 पुसलकर, पूर्वनिर्दिष्ट, पृ0 376

7.     उपाध्याय, आचार्य बलदेव, पूर्वनिर्दिष्ट, पृ0 152

8.     बंशी, बलदेव, भारतीय नारी सन्त परम्परा, नयी दिल्ली, 2011, पृ0 44

9.     भण्डारकर, आर0जी0, पृ0 73

10.    उपाध्याय, आचार्य बलदेव, पूर्वनिर्दिष्ट, पृ0 152

11.    वही, पृ0 151-52

12.    वही, पृ0 152

13.    उद्धृत, मजुमदार, आर0सी0 एवं 0डी0 पुसलकर, पूर्वनिर्दिष्ट, पृ0 382

14.    वही, पृ0 382

15.    बंशी, बलदेव, पूर्वनिर्दिष्ट, पृ0 45

 

 

Received on 10.12.2016       Modified on 18.12.2016

Accepted on 28.12.2016      © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences. 2016; 4(4):189-192.