महिला सशक्तिकरणकी अवधाराणा और हिंदी

 

बृजेन्द्र पाण्डेय

सहायक प्राध्यापक, मानव संसाधन विकास केन्द्र, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर

*Corresponding Author E-mail: brijpandey09@gmail.com

 

 

यदि महिला सशक्तिकरणको सचमुच समझना चाहते हैं तो इसे थेरीगाथासे उद्धृत निम्न कविता से समझा जा सकता है:

 

‘‘एक पूर्ण मुक्तवादी ! मैं कितनी मुक्त

कितने आश्चर्यजनक रूप से मुक्त

रसोई के खटराग से मुक्त

ठनठनाते खाने के बरतनों से मुक्त

मुक्त उस बेईमान आदमी से ।’’

 

लगभग 2500 वर्ष पहले महिलाओं द्वारा लिखी गयी इस कविता में स्त्रियों की मुक्ति-कामना को तरह-तरह से व्यक्त किया गया है जो भी बंधन उसे बंधता है, उसे वह तोड़ देना चाहती है । पूर्ण रूप से मुक्त होना चाहती है, लेकिन है वह विवश! बावजूद इसके वह मुक्त होना चाहती है । फिलीपीन की सूजन मैगनों की कविता थेरीगाथासे भी आगे की बात करती है:

‘‘विश्व की औरतों

अपनी शक्ति पहचानों

जंजीरों को तोड़ो

मुक्त होकर

अपने लिए नए विश्व की घोषणा करो

जहां वर्ग और जाति न हो

सब स्वतंत्र और समान हों

जहां न्याय हो

ताकि हम मनुष्य की तरह जी सकें ।’’

 

 शायद जंजीरों को तोड़ना या प्रतिरोध करना नारीवादका मूल स्वर है । इसीलिए कमला भसीन और निगहत सईद खान ने स्वीकार किया है कि समाज में काम के स्थान और परिवार में होने वाले स्त्रियों के दमन व शोषण के प्रति चेतना तथा स्त्रियों व पुरूर्षो द्वारा इन परिस्थितियों को बदलने की दिशा में जागरूक सक्रियता को ही नारीवादकहा जा सकता है । तात्पर्य यह कि जो कोई समाज में लिंगवाद यानी लिंग के आधार पर भेदभाव, पुरूष आधिपत्य तथा पितृ सत्ता की उपस्थिति को स्वीकार करतह है/करता है तथा उसके विरूद्ध कार्रवाई करती है/करता है, वह नारीवादी है । इस परिभाषा से यह आशय भी निकलता है कि मात्र लिंगवाद को पहचानना काफी नहीं है, बल्कि पुरूष आधिपत्य को चुनौती देना और उस पर हमला करना एक आवश्यक शर्त है ।

 

ऐसा नहीं कि पहले स्त्रियों के अधिकारों के लिए लडने वाली महिलाएं नहीं रही है, लेकिन पहले और अब की स्त्रियों में मुख्य अंतर यह है कि पहले वे स्त्रियाँ लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही थीं जिसके अंतर्गत शिाक्षा व रोजगार का अधिकार, मतदान का अधिकार, संसद मं प्रवेश पाने का अधिकार, तलाक का अधिकार आदि खास मुद्दे थे । तात्पर्य यह कि पहले की नारीवादी स्त्रियाँ कानूनी सुधारों के लिए लड़ रही थी, कानूनन समान स्थान पाने के लिए लड़ रही थी तथा यह संघर्ष आवश्यक रूप से घर और परिवार के दायरे से बाहर था । लेकिन आज की नारीवादी स्त्रियां स्त्रियों की मुक्ति के लिए संघर्ष कर रही हैं । इससे घर के भीतर स्त्री पर पुरूष के दबाव और अधिकार के विरूद्ध संघर्ष, परिवार द्वारा उनके शोषण के विरूद्ध संघर्ष, कार्य-स्थान में उनकी गिरी हुई स्थिति, समाज, संस्कृति और धर्म के द्वारा दिये गये निचले दर्जे के विरूद्ध संघर्ष तथा बच्चे पैदा करने और पालने के साथ-साथ उत्पादन के दोहरे बोझ के विरूद्ध संघर्ष भी शामिल है । यानी नारीवाद के अनुसार स्त्रियों को न केवल भेदभाव के विरूद्ध लड़ना है बल्कि सरकार, समाज और पुरूषों के द्वारा किये जाने वाले दमन के सभी रूपां से स्वतंत्रता और मुक्ति पाने के लिए भी लड़ना है ।

 

बकौल कमला भसीन और निगहत सईद खान पितृसत्ताही बीमारी की असल जड़ है जो सदियों से चली आ रही है औरतों की गुलामी का प्रमुख कारण है । औरतों की जिंदगी के तकरीबन हर क्षेत्र में पितृसत्तात्मक नियंत्रण दिखलाई पड़ता है । जैसे, 1. औरतों के उत्पादन या श्रम शक्ति पर मर्द का दोहरा नियंत्रण है क्योंकि घर के भीतर औरत द्वारा किये जाने वाले श्रम पर भी और घर के बाहर कमाई के लिए की जाने वाली मजदूरी पर भी उसी का हक है ।

 

2. औरतों की प्रजनन शक्ति पर भी पुरूष अपना नियंत्रण रखता है, मसलन बच्चों की संख्या, उनके जन्म का समय, गर्भ निरोधकों का इस्तेमाल जैसे औरतों से ताल्लुक रखने वाले बुनियादी मुद्दों का फैसला भी मर्द ही करता है ।

 

3. औरत की यौनिकता पर भी पुरूष का ही नियंत्रण है । मतलब यह कि पुरूषों की इच्छाओं और जरूरतों के अनुसार औरतों को यौन सुख देना ही चाहिए । लगभग सभी समाजों में शादी के संबंध के बाहर औरत की यौनिकता के लिए कोई जगह नहीं है । उसे रोकने के लिए नैतिक और कानूनी बंदिशें है, जबकि मर्दों के लिए कोई रोक-टोक नहीं है।

 

4. औरतों की गतिशीलता पर भी मर्दों का ही नियंत्रण है । औरतों के लिए पर्दा, घरेलू क्षेत्र तक उनके दायरे की सीमा, उस सीमा को छोड़ने पर रोक, पारिवारिक और सार्वजनिक दायरों के बीच बड़ा साफ फर्क, स्त्रियों और पुरूषों के बीच कम से कम संपर्क आदि सभी बातें अपने ढंग से औरत की आजादी और गतिशीलता पर नियंत्रण करती है, जबकि इसके उलट मर्दों पर कोई बंदिश नहीं है ।

 

5. संपत्ति तथा अन्य आर्थिक संसाधनों पर भी मर्दों का ही नियंत्रण है । आमतौर पर यह एक मर्द से दूसरे मर्द यानी पिता से पुत्र के हाथों में जाता है । एक सर्वे के मुताबिक औरतें सारी दुनिया में किये गये काम के घंटों में 60 प्रतिशत से अधिक का योगदान देती है, जबकि उन्हें दुनिया की कुल आय का सिर्फ 10 प्रतिशत मिलता है और वे केवल 1 प्रतिशत संपत्ति की मालकिन है ।

 

समाज की सभी मुख्य संस्थाओं का विश्लेषण करने के बाद लेखिकाओं ने यह निष्कर्ष निकाला है कि समाज अपने स्वभाव, चरित्र और ढर्रें में पूरी तरह पितृसत्तात्मक है । इनमें परिवार जो समाज की बुनियादी इकाई है, शायद सबसे अधिक पितृसत्तात्मक है । परिवार के भीतर वही और यौनिकता, मेहनत, उत्पादन, प्रजनन और गतिशीलता पर नियंत्रण रखता है । यांे तो परिवार का मुखिया परिवार के छोटे लड़कों और मर्दों पर भी नियंत्रण रखता है । लेकिन सबसे अधिक बंदिशें औरतों पर ही लागू की जाती है । विरासत के मामले में भी पुरूष ही सदा उत्तराधिकारी बनता है, स्त्रियाँ नहीं । आज के लड़के कल के मुखिया बनेंगे, जबकि औरतें मर्दों से सदा नीचे रहेंगी । आगामी पीढ़ियों को पितृसत्तात्मक मूल्य देने और सिखाने का काम भी परिवार ही करता है । परिवार ही वह संस्था है जिसमें सबसे पहले ऊंच-नीच, पदानुक्रम और लिंग आधारित भेदभाव की नींव  पड़ती है । लड़कों को रोब जमाने की शिक्षा दी जाती है, जबकि लड़कियों को दबने और भेदभाव स्वीकारने की ।

 

जहां तक धर्म का सवाल है तो अधिकांश आधुनिक धर्म पितृसत्तात्मक है जो पुरूष प्रभुत्व को सर्वोपरि मानते है । धर्म के मौजूदा संस्थागत रूप से पहले स्त्री शक्ति के जिस रूप की पूजा होती थी, वह धीरे-धीरे कमजोर पड़ गया । देवियों की जगह देवताओं ने ले ली । अधिकतर धर्मो को उच्च वर्ग और उच्च जाति के मर्दों ने बनाया, परिभाषित  किया और उस पर नियंत्रण रखते है । कानूनी व्यवस्था का भी वही हाल है । अधिकतर देशों में कानूनी व्यवस्था पितृसत्तात्मक तथा बुर्जुआ दोनों है । यानी वह पुरूष तथा आर्थिक रूप से सशक्त वर्ग की पक्षधर है । जहाँ तक आर्थिक व्यवस्था तथा आर्थिक संस्थाओं का सवाल है, तो इसके तहत पुरूष ही आर्थिक संस्थाओं, अधिकांश संपत्ति व आर्थिक गतिविधियों पर नियंत्रण रखते है । ऐसा ही मामला राजनैतिक व्यवस्था तक संस्थाओं का भी है । ग्राम पंचायतों से लेकर संसद तक सभी स्तरों पर पुरूषों का ही बोलबाला है । राजनैतिक दलों व संगठनों में औरतें गिनती की है । जनसंचार माध्यमों पर भी कब्जा मर्दों का ही है । फिल्मों से लेकर टेलीविजन तथा पत्र-पत्रिकाओं, रेडियों सभी जगह औरतों की घिसी-पिटी विकत छवि को प्रदर्शित किया जाता है । शब्दों और छवियों के जरिए पुरूष उच्चता और स्त्रियों की नीचता को दर्शाने वाले कार्यक्रम तैयार किये जाते है । विज्ञापनों में तो औरत के शरीर को एक प्रोडक्ट के रूप में ही पेश किया जा रहा है । शिक्षण संस्थाओं पर भी पुरूषों का ही कब्जा है । दर्शन, धर्मशास्त्र, विधि, साहित्य,कला तथा विज्ञान सभी अंग पुरूषों के नियंत्रण में है । पुरूष प्रभुत्ववाली शिक्षा व ज्ञान पितृसत्तात्मक विचारधारा को ही पैदा करते है ।

 

पुरूषों के इसी पितृसत्तात्मक रूख को देखते हुए नारीवादी लेखिकाओं को उन पर यकीन ही नहीं है । क्योंकि सीमोन द बोउआर ने द सेकेण्ड सेक्स’ (स्त्रीः उपेक्षिता) मंे एक नारीवादी के हवाले से स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है - ‘‘अब तक औरत के बारे में पुरूष ने जो कुछ भी लिखा, उस पूरे पर शक किया जाना चाहिए, क्योंकि खिने वाला न्यायाधीश और अपराधी, दोनों ही है’’ इसीलिए सीमोन कहती है कि हर जगह और हर समय में पुरूष ने अपनी संतुष्टि का यह कहकर प्रदर्शन किया कि वही जगत का सर्जक है। उन्होंने यहूदियों की सुबह की प्रार्थना का उल्लेख किया है जिसमे वे कहते हैं, ‘‘प्रभु, तुम्हारी कृपा है कि तुमने मुझे अपनी इच्छा से गढ़ा है ।’’ फिर प्लेटो का हवाला देते हुए कहती है कि प्लेटो ने ईश्वर की सबसे बड़ी कृपा यह मानी थी कि उसने उसका स्वतंत्र निर्माण किया कि वह गुलाम नहीं था और दूसरी कृपा यह मानी कि वह पुरूष बना, औरत नहीं, किंतु पुरूष अपनी इन सुविधाओं का पूरा और अबोध भोग तक नहीं कर सकता, जब तक कि अपनी श्रेष्ठता को वह अधिकार के रूप में न रखे । पुरूष होने वह यह अर्थ था कि वह अपने वर्ग की सुविधा के लिए कानून बनायें, अपने वर्गहित का ध्यान रखे और साथ ही वह ऐसा जूरी बने, जो इन कानूनों को सिद्धांत में परिणत कर दें । यानी औरत यदि पुरूष पर यकीन करती है तो वह अपने को धोखे में रखती है । शायद इसीलिए लेखिका ममता कालिया लिखती हैं कि जब स्त्री को लगा कि उसका अस्तित्व, स्थान, अधिकार और आजादी संकट में है तो उसे अपने विचारों को अभिव्यक्ति देनी पडी । वे मानती हैं कि अपनी छवि के बने बनाये चैखटों को तोड़कर बाहर निकलने की छटपटाहट स्त्री के अंदर युगों से चल रही है ।

 

जहां तक हिन्दी में स्त्रीवादी साहित्य का सवाल है तो उसे आलोचक खींचकर भक्तिकाल में मीरा बाई से जोड़कर देख रहे है अथवा इससे पीछे दक्षिण में अलवारनयनार संतों (सातवीं सदी) में आंडालनामक महिला संत की चर्चा कर रहे हैं । कबीर और तुलसी का तो स्त्री विरोधी रूख नुमाया ही है, लेकिन सूरदास को स्त्रियों की मुक्ति के कवि तथा मीरा को विद्रोहिणी कवयित्री के रूप में देखा जा रहा है । आधुनिक साहित्य में यों तो जैनेन्द्र के उपन्यासांे और प्रेमचंद के कथेतर साहित्य को कथा साहित्य से ज्यादा स्त्री-विमर्श के अनुकूल माना जा रहा है, लेकिन सुश्री महादेवी वर्मा को उनकी श्रृंखला की कड़ियाँया स्मृति की रेखाएँके आधार पर स्त्री विमर्श का अलंबरदार माना जा रहा है। बायें बाजू के सुप्रसिद्ध आलोचक मैनेजर पाण्डेय ने अनभै साँचामें नारी चेतना की भारतीय परंपरा पर विचार करते हुए महादेवी वर्मा के संबंध में लिखा है - ‘‘इस सदी के पूर्वार्द्ध में, जब भारत में तो क्या पश्चिम में भी साहित्य की स्वतंत्र स्त्री दृष्टि पर कोई खास बहस नही हो रही थी तब महादेवी वर्मा ने कहा था - पुरूष के द्वारा नारी का चरित्र अधिक आदर्श बन सकता है । परंतु अधिक सत्य नहीं, विकृति  क अधिक निकट पहुंच सकता है परंतु यथार्थ के अधिक समीप नहीं ।’’ यह अकारण नहीं है जब प्रभा खेतान  यह सवाल उठाती हैं कि स्त्रीवाद में भी स्वानुभूति बनाम सहानुभूति का मुद्दा अहम है क्योंकि वे कहती हैं कि यदि लियो टाॅलस्टाॅय के बजाय किसी स्त्री लेखिका के हाथ अन्ना कैरेनीना, शरत्चन्द्र के शेषेर प्रश्नकी स्त्रियां और देवदासकी पारो पड़ती तो क्या इनका वही स्वरूप होता जो पुरूष लेखकों के हाथों पड़ने से हुआ है? जाहिर है कि स्त्रयां इन्हंे रचतीं तो इनका स्वरूप कुछ और होता । प्रभा खेतान की तरह सुमन राजे को भी लगता है कि स्त्रियों की उपेक्षा का कारण पुरूष ही हैं । क्योंकि पुरूष इतिहासकारों खासकर रामचन्द्र शुक्ल के स्त्री विरोधी रवैये के कारण व्यथित होकर उन्होंने आधा इतिहासही लिख डाला । क्या पुरूष भी स्त्रीवादी लेखक हो सकता है, इस प्रश्न का उत्तर मशहूर आलोचक परमानंद श्रीवास्तव कुछ यों देते हुए कहते है कि यदि पुरूष अपने को स्त्री समझकर लिखे, उसके दृष्टकोण से लिखे तो वह भी स्त्रीवादी लेखक हो सकता है । शायद इसी नजरिये से वे जैनेन्द्र के प्रायः सभी प्रमुख उपन्यासों, अज्ञेय के नदी के द्वीपप्रेमचन्द के निर्मलाएवं फणीश्वरनाथ रेणु के मैला आंचल को देखते है और मनते है कि यदि यह सब न होता तो आज का स्त्रीवादी लेखन भी न होता । जहां तक समकालीन स्त्रीवादी साहित्य का संबंध है तो निर्मला अग्रवाल ने अपने लेख स्त्री विमर्श का साहित्यिक संदर्भ में अमृता प्रीतम (रसीदी टिकट), इस्मत चुगताई (लिहाफ), कृष्णा सोबती (सूरजमुखी अंधेरे के, मित्रो मरजानी), मन्नू भंडारी, (आपका बंटी), चित्रा मुद्गल (आवाँ, एक जमीन अपनी), ममता कालिया (बेघर), मृदुला गर्ग (कठ गुलाब, उसके हिस्से की धूप), प्रभा खेतान (छिन्नमस्ता, पीली आंधी), मंजुल भगत (अनारो), मैत्रेयी पुष्पा (चाक, इदन्नमम), शशिप्रभा शास्त्री (सीढ़ियां), राजी सेठ (तत्सम), मेहरून्निसा परवेज़ (अकेला पलाश), कुसुम अंसल (अपनी-अपनी यात्रा), मृणाल पांडेय (लड़कियां), अलकासरावगी (कलिकथा वाया बाइपास), नासिरा शर्मा (ठीकरे की मंगनी शाल्मली’), गीतांजलि श्री (तिरोहित, माई), दीप्ति खंडेलवाल (प्रतिध्वनियां, देह की सीता) आदि लेखिकाओं का नाम लिया है जो कथा साहित्य के जरिए स्त्री विमर्श में योगदान दे रही हैं, आजकल साहित्यिक पत्रिकाओं के जरिए जो लेखिकाएं सामने आ रही है, खासकर कथा साहित्य में महुआ मांझी, मधु कांकरिया, नीलाक्षी सिंह और शरद सिंह, जिनका उल्लेख परमानंद जी करने से भूलते नहीं, वे इनके रचनाकर्म को भी स्त्रीवादी लेखन के अंदर ही रखकर चलते हैं । कथा साहित्य के अलावा कविताओं के क्षेत्र में यदि कात्यायनी, गगन गिल, अनामिका, निर्मला र्ग, सविता सिंह, अनीता वर्मा, जया जादवानी, संध्या गुप्ता, सुनीता बुद्धिराजा, स्नेहमयी आदि का नामोल्लेख न किया जाय तो पूरा परिदृश्य सामने नहीं आ पायेगा । इधर हाल के वर्षों में तहमीना दुर्रानी, किश्वर नाहिद, तस्लीमा नसरीन, प्रभा खेतान और रमणिका गुप्ता की जो आत्मकथाएं प्रकाशित हुई है, उनसे भी पुरूष का चेहरा बेनकाब हुआ है जिसे स्त्री लेखन की बड़ी उपलब्धि कहा जा सकता है । स्पष्ट है कि दलित साहित्य की तरह स्त्री साहित्य भी समकालीन विमर्श की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है जिसकी अनदेखी करना पुरूषों के लिए संभव नहीं, लेकिन पुरूष सत्ता के खिलाफ वह आम स्त्रियों की जिंदगी कितना बदल पाता है, यह देखने की बात होगी क्योंकि समाज की खास औरतों की जिंदगी तो बदलती हुई दिख रही है । लेकिन आम औरतों की जिंदगी में कोई तब्दीली नजर नहीं आती, जबकि आम औरतों द्वारा पुरूष सत्ता के खिलाफ बगावत ही असली स्त्री विमर्श है ।

 

संदर्भ गृन्थ सूचीः

01.          सशक्तीकरण- जागृति और विकास की आवश्यकता.ः मीरा सेठ, योजना अगस्त 2001 पृ. क्र.09

02.          महिला सशक्तीकरण मे शिक्षा का महत्व- प्रतापमल,कुरूक्षेत्र,मार्च 2008, पृ. क्र.06

03.          भारतीय नारी ’’सामाजिक अध्ययन’’-डा़. राजकुमार

04.          व्ूामेन डेवलपमेन्ट रिपोर्ट, राष्टीय महिला आयोग।

05.          स्त्री चिंतन की चुनौतियाॅ- डाॅ. रेखा कस्तवार

06.          इन्साइक्लोपीडिया आॅफ वूमेन-07,वाल्यूम 2007

07.          श्रीमती देसाई एम. एम. वूमेन वेल केयर इन हिस्ट्री एण्ड फिलाॅसफी आॅफ सोशल वर्क इन इंडिया (1961) पृ. क्र.1654

08.          डाॅ. शर्मा रामअवतार ’’भारतीय राजनीति’’-हिन्दी माध्यम कार्यान्वयन कार्यान्वयन निदेशालय,दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली,1997, पृ. क्र.159

09.          डाॅ. राजेश जैन ’’भारत मे राष्ट्रीय महिला उत्थान नीति एवं महिला सशक्तीकरण, महिला विधि भारती, विधि भारती परिषद, शालीमार बाग, दिल्ली अंक 33, पृ. क्र.87

10.          डाॅ. डी. एल. शर्माः ‘‘यत्र नार्यस्तु पूज्यनते’’ के देश मे नारी शिक्षाः पोइन्टर पब्लिकेशन, जयपुर, 2001, पृ. क्र.28,29

11.          डाॅ. आरती पाण्डेय,‘‘चातुर्वण्र्य से जूझती महिलाएॅं‘‘ नई दुनिया, इन्दौर, पृ.क्र.08,मार्च 2008

12.          श्रीमती देसाई एम. एम. वूमेन वेल केयर इन हिस्ट्री एण्ड फिलाॅसफी आॅफ सोशल वर्क इन इंडिया (1961) पृ. क्र.1751

 

 

Received on 12.06.2015       Modified on 18.06.2015

Accepted on 25.06.2015      © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences 3(2): April-June, 2015; Page 97-100